हकीम लुकमान ने यौन क्रिया के बारे में मनुष्य को साफ हिदायत दी थी कि 'यदि तू रोजाना इस क्रिया को करना चाहता है तो अपने साथ एक कफन भी तैयार रख।' अरस्तु ने भी एक बार सिकन्दर को लिखा था कि 'काम उत्तेजना के वशीभूत मत हो, यह प्रकृति शूकर (सूअर) की है।'
आयुर्वेद के अनुसार धातु शक्ति है, शक्ति ही जीवन है, शक्ति ही तरुणाई या जवानी है। शक्ति की कमी बुढ़ापा है और शक्ति का नाश मृत्यु है। बहु मैथुन से धातु का नाश होता है, इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता।
हम यहां किसी वैचारिक विवाद में न पड़ते हुए सिर्फ इतना बताना चाहते हैं कि यह क्रिया सदा स्त्री-पुरुष के बीच एक सीमा में होनी चाहिए। बहु मैथुन (प्रतिदिन एक से अधिक बार मैथुन करना) से अनेक शारीरिक समस्याएं उत्पन्न होती हैं, जो इस प्रकार हैं-
हानि
* प्रमेह (मूत्र संबंधी) रोगों का उत्पन्न होना, स्वप्नदोष, शीघ्रपतन आदि समस्याओ का शिकार होना।
* पुठ्ठों का कमजोर होना तथा पीठ में दर्द होना, मस्तिष्क में कमजोरी आना तथा स्मृति भ्रंश (याददाश्त में कमी) का शिकार होना।
* चक्कर आना, आंखों के आगे अंधेरा छा जाना, नजर कमजोर होना, सिर में दर्द होना, भूख की कमी होना, पाचन बिगड़ना, लीवर कमजोर होना।
* चेहरा मुरझा जाना, आंखों का अंदर धंस जाना, चेहरे की हड्डियां निकल आना, आंखों की चमक कम होना, उदासी, प्रत्येक कार्य करने से जी उकताना।
* अमाशय एवं गुर्दों का कमजोर होना, हृदय-पेशियों का कमजोर पड़ना, नजला, जुकाम, मूत्राशय की कमजोरी इत्यादि।
रति क्रिया के नियम
* दिन के समय कभी भी सहवास न करें, सहवास (मैथुन) हमेशा रात में ही करना चाहिए वह भी सिर्फ एक बार। हो सके तो इसमें भी 'गैप' दें।
* सूर्योदय के कुछ समय पूर्व से लेकर सूर्योदय के बाद यानी ब्रह्य मुहूर्त में किया गया सहवास स्वास्थ्य की दृष्टि से हानिकारक है।
* जो लोग शाम सात बजे तक भोजन कर लेते हैं, उनको छोड़कर शेष लोगों को जो कि भोजन रात्रि 10-11 बजे तक करते हैं, सहवास आधी रात के बाद करना हितकारी है।
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