शंखचालनी मुद्रा के लिए वज्रासन में बैठकर योनि को इस तरह खींचे जैसे पेशाब के वेग को रोकना हो और थोड़ी देर तक खींचे हुए रखकर छोड़ दें। इस क्रिया को भी 50-60 बार करें, अच्छा अभ्यास हो जाने पर बिना वज्रासन के भी चलते-फिरते या बैठे हुए यह दोनों क्रियाएं की जा सकती हैं।
(4) मैनफल, मुलहठी और कपूर तीनों को समान मात्रा में खूब कूट-पीसकर महीन करके मिला लें और पोटली बना लें। चुटकीभर माजूफल का महीन पिसा चूर्ण जरा से शहद में मिला लें। इस लेप को अंगुली से योनि के अंदर ठीक प्रकार सब तरफ लगाकर यह पोटली सोते समय योनि के अंदर सरकाकर रख दें। प्रातः इससे निकालकर फेंक दें।
(5) कूठ, धाय के फूल, बड़ी हरड़, फिटकरी, माजूफल, लोध्र, भांग और अनार के छिलके सब 10-10 ग्राम, इन्हें कूट-पीसकर चूर्ण कर लें 250 ग्राम शराब में डालकर 7 दिन तक रखें। दिन में 2-3 बार हिला दिया करें। आठवें दिन कपड़े से छानकर शीशी में भर लें इसमें रूई का फाहा भिगोकर योनि में अंदर चारों तरफ लगाने से योनि की शिथिलता, विस्तीर्ण तथा दीर्घमुख होने की स्थिति दूर होती है। आवश्यकता रहे तब तक यह प्रयोग करते रहना चाहिए।
यह सभी उपाय एक से बढ़कर एक हैं, एक बार में सिर्फ एक ही उपाय करें। ये सभी परीक्षित नुस्खे हैं।
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