मुख्य पृष्ठ > विविध > सेहत > जडी-बूटियाँ
सुझाव/प्रतिक्रियामित्र को भेजियेयह पेज प्रिंट करें
 
अतीस : अनेक गुणों से युक्त
अतीस के आयुर्वेदिक यो
जिन प्रसिद्ध आयुर्वेदिक योगों के घटक द्रव्यों में अतीस भी शामिल है, उन योगों का संक्षिप्त परिचय पाठक-पाठिकाओं की ज्ञानवृद्धि के लिए यहां प्रस्तुत कर रहे हैं।

अतिविषादि वटी : अतीस, नागरमोथा, काकड़ासिंगी, करंज 10-10 ग्राम लेकर कूट-पीसकर खूब महीन चूर्ण बना लें। कूड़ा की छाल का काढ़ा बनाकर, यह चूर्ण डालकर खरल में घुटाई करके, एक-एक रत्ती की गोली बना लें। आधी-आधी गोली दिन में दिन बार पानी या दूध के साथ दें। बच्चों के उदर विकारों के लिए यह योग उत्तम है।

चंद्रभ्रभावटी विशेष नं. 1 : यह आयुर्वेद का सुप्रसिद्ध योग है, जिसमें अतीस के साथ शुद्ध शिलाजीत, नागरमोथा, कबाब चीनी आदि घटक द्रव्यों के अलावा अन्य गुणकारी द्रव्य भी मिलाए जाते हैं। यह योग मूत्र और वीर्य संबंधी रोगियों के लिए बहुत गुणकारी सिद्ध हुआ है। यह प्रमेह और मधुमेह के रोगी के लिए भी अति लाभप्रद सिद्ध हुआ है। इस वटी का लगातार 2-3 मास तक सेवन करने से शरीर पुष्ट होता है, यौन शक्ति बढ़ती है, नपुंसकता, स्वप्न दोष, शीघ्रपतन, इंद्रिय शिथिलता आदि शिकायतें दूर होती हैं।

मन्मथ रस : आयुर्वेद के इस सुप्रसिद्ध यौनशक्ति वर्द्धक और वाजीकरण योग में भी अतीस का उपयोग किया जाता है। यह योग धातु पौष्टिक, स्तंभन शक्ति बढ़ाने वाला और नपुंसकता का नाश करने के लिए प्रसिद्ध है।

इन सुप्रसिद्ध श्रेष्ठ आयुर्वेदिक योगों के अतिरिक्त पंचतिक्त घृत गुग्गुलु, पंचनिम्बादि वटी, रक्त शोधान्तक आदि रक्त विकार, फोड़े-फुंसी नाशक योग, कृमिनाशक कृमिनोल सीरप और टेबलेट, वातरोगनाशक योगराज गुग्गुल, महायोगराज गुग्गुल और ज्वरनाशक ज्वरान्तक वटी जैसे प्रसिद्ध योगों में अतीस को एक प्रमुख घटक द्रव्य के रूप में शामिल किया गया है।

बच्चों हेतु नुस्खा इस प्रकार ह
अतीस, नागरमोथा, काकड़ासिंगी, सोंठ और आम की गुठली से निकलने वाली गिरी (मींगी) इन पाँचों द्रव्यों को साबुत यानी बिना कूटे-पिसे ला कर, बारी-बारी से एक-एक द्रव्य को पानी के साथ, पत्थर पर चंदन की तरह 20 या 25 बार घिसकर पूरा लेप कटोरी में उतार लें।

इसे अंगुली से खूब अच्ची तरह से घोल लें फिर चाय वाले चम्मच से आधा चम्मच घोल लें और एक चम्मच पानी में मिलाकर बच्चे को पिला दें और बाकी बचे घोल को फेंक दें यानी रोजाना ताजा घसारा तैयार करें और सिर्फ आधा चम्मच घोल लेकर बाकी घोल फेंक दें।

यह घोल सिर्फ एक बार दोपहर में बच्चे को पिलाना है। यह प्रयोग कम से कम 21 दिन तक करें, फिर जब पेट में विकार पैदा हो तब-तब इस नुस्खे का प्रयोग शुरू कर दें और आराम होने पर प्रयोग बंद कर दें।
<< 1 | 2 | 3 
और भी
अर्जुन : हृदय रोग की जड़ी
सत्यानाशी