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देवेन्द्र उपाध्या
Health News
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अलग राज्य बनने के बाद उत्तराखण्ड में औषधीय पौधों की खेती को बढ़ावा देने की तरफ सरकार का ध्यान गया है। प्राचीन ग्रंथों में इस क्षेत्र को औषधियों और जड़ी-बूटियों का गढ़ कहा गया था, वह सही भी है। आजादी के बाद विकास की नई अवधारणा के चलते औषधियों और जड़ी-बूटियों की उपेक्षा हुई, लेकिन अब उस दिशा में राज्य प्रशासन और यहाँ के नागरिक फिर सक्रिय हुए हैं।

राज्य को हर्बल बनाने की परिकल्पना की गई है। किसानों को औषधीय पौधों की खेती करने, उनकी आसवनी तैयार करने और उद्यमियों को प्रोत्साहित करने का काम जारी है। देहरादून के सेलाकुई में सुंगध पौधा केंद्र की स्थापना 2003 में की गई। यह केंद्र पिछले 6 वर्षों के भीतर औषधीय पौधों के वाणिज्यिकरण का एक सफल मॉडल बन चुका है।

यहाँ प्रशिक्षण, विस्तार, प्रसंस्करण, विपणन और अनुसंधान एवं विकास की सुविधाओं का लाभ छत के नीचे उपलब्ध है। राज्य के विभिन्न जिलों में 2003 से लेकर मार्च 2009 तक 27 औषधीय पौधे क्लस्टर स्थापित किए जा चुके हैं तथा 22 डिस्टिलेशन इकाइयों की स्थापना हो चुकी है। राज्य के 1004 हैक्टेयर क्षेत्र में 7121 किसान औषधीय पौधों की खेती कर रहे हैं। औषधीय तेल और विपणन जहाँ 183 क्विंटल हुआ है, वहीं औषधीय हर्ब्स का उत्पादन 977 क्विंटल पहुँच गया।

जहाँ 5020 लोगों को रोजगार मिला, वहीं 3674 को औषधीय पौधों की खेती एवं व्यावसायीकरण संबंधित जानकारी का प्रशिक्षण दिया गया। करीब 45 लाख रुपए के राजस्व की प्राप्ति हुई। औषधीय पौधों की खेती के लिए 28 प्रदर्शन प्लाट स्थापित किए गए तथा 20 प्रदर्शनियों में केंद्र ने भागीदारी की।

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अच्छी किस्म की पौध कम लागत में उपलब्ध कराने के लिए उच्च तकनीक वाली नर्सरी बनाने की जरूरत है। उस दिशा में भी काम हो रहा है। प्रभावित प्लांटिंग सामग्री किसानों को सही कीमत पर उपलब्ध कराई जा सके, इसके लिए प्रयत्न किया जा रहा है और किसानों में भी जागरूकता आ रही है।

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जंगली जानवरों (हाथी, बंदरों और सुअरों) के प्रकोप से किसानों की मेहनत पर हर साल पानी फिर जाता है, क्योंकि वे फसलें बर्बाद कर देते हैं, लेमनग्राम की खेती शुरू करने के बाद जंगली जानवरों का खेतों में घुसना कम हुआ है। दरअसल इसके लिए कोई अतिरिक्त प्रयास नहीं करना पड़े, लेमनग्राम की खुशबू ही ऐसी है कि जंगली जानवर उससे बिदकते हैं और फसल के नजदीक नहीं आते।

उत्तराखण्ड में ही सौ से भी अधिक ऐसी इकाइयाँ हैं, जो आयुर्वेदिक दवाइयाँ औषधीय पौधों से ही तैयार करती हैं। सुंगध पौधा केंद्र के प्रयास से किसानों, उत्पादकों और व्यापारियों निर्यातकों को बेहतरीन अवसर मिल रहे हैं। पारंपरिक खेती की बजाय सुंगध पौधों की खेती करने में कम खर्च में अधिक आमदनी तो होती है, जंगली जानवरों के आक्रमण से फसलों को होने वाले नुकसान में कमी आ रही है।
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