साफ-सफाई और शौचालय का सेहत के नजरिए से तो महत्व है ही, साथ ही यह गरीबी दूर करने के लिए भी महत्वपूर्ण है। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के मानव विकास प्रतिवेदन के अनुसार शौचालय बनाने के लिए खर्च किए जाने वाले धन का दूरगामी प्रभाव पड़ता है। किसी भीइ विकास कार्यक्रम के मद पर होने वाला यह एकमात्र ऐसा व्यय है, जो अपनी लागत का नौ गुना वास्तविक लाभ देता है। स्वच्छता के मामले में इंदौर में इस के लिए काफी पहले से पहल की जा चुकी है।
चीन के बाद भारत सबसे बड़ी आबादी वाला देश है। पिछले पाँच दशक में जहाँ आबादी में ढाई गुना वृद्धि हुई, वहीं शहरी क्षेत्र में इसका अनुपात पाँच गुना था। एक अनुमान के मुताबिक शहरी भारत में कोई एक तिहाई आबादी गरीबी रेखा के नीचे गुजर-बसर कर रही है और इनका 15 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा साफ पानी से वंचित है। इसमें से 50 प्रतिशत के पास स्वस्छता सुविधाएँ भी नहीं हैं।
बीस के दशक में सर अल्बर्ट ने ऐसे शौचालयों के बारे में शोध किया था, जो कंपोस्ट तैयार करते हैं। आज भी इस माडल को इंदौर मॉडल के नाम से जाना जाता है। इंदौर में आयोजित एक सेमिनार में यह बात सामने आई। सेमिनार के मौके पर पर्यावरणविद् गोपालन कुट्टीमेनन ने बताया कि पीने योग्य पानी का केवल 3 से 4 प्रतिशत ही पीने या भोजन बनाने के काम में आता है, बाकी पूरा पानी अन्य कार्यों में नष्ट हो जाता है। गोपालन ने पानी को सभी आम और खास आदमी का सरोकार बताते हुए कहा कि रिसाइकलिंग से पानी की बचत में मदद मिल सकती है।
| | पिछले पाँच दशक में जहाँ आबादी में ढाई गुना वृद्धि हुई, वहीं शहरी क्षेत्र में इसका अनुपात पाँच गुना था। एक अनुमान के मुताबिक शहरी भारत में कोई एक तिहाई आबादी गरीबी रेखा के नीचे गुजर-बसर कर रही है और इनका 15 प्रतिशत हिस्सा साफ पानी से वंचित है। |
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वक्ताओं ने इस बात पर भी चिंता जताई कि पानी की कमी के कारण लोगों को गंदा पानी पीना पड़ता है। अस्वच्छता के कारण विश्व के करीब डेढ़ करोड़ बच्चे दम तोड़ देते हैं। सेमिनार में शौचालयों की स्थिति की भी समीक्षा की गई और भारत सरकार से निर्मल ग्राम कार्यक्रम की सराहना की गई। वहीं उन्होंने उसे कार्यांवयन पर आशंका जताई।
वाटर फॉर एशियन सिटीज WAC कार्यक्रम, जो यूएन हैबिटेट का संयुक्त पहल है, ने सन 2015 तक सहस्त्राब्दी विकास लक्ष्य के अंतर्गत सबके लिए सुरक्षित पेयजल और स्वच्छता सेवाएँ उपलब्ध कराने की वचनबद्धता जाहिर की है।
यूएन जनरल एसेंबली में हाल ही में सेकेट्ररी जनरल बेन किमून ने इस प्रस्ताव के प्राथमिकता देने की अपील की। उन्होंने जल की खराब गुणवत्ता और स्वच्छता की कमी को जोड़त हुए कहा कि सफाई की कमी और दूषित जल के कारण पूरी दुनिया में हर सप्ताह करीब 42 हजार लोगों की मौत हो जाती है।
संयुक्त राष्ट्र ने साफ पानी, शौचालय और स्वच्छता की सुविधा से रहित ऐसे लोगों के विकास के लिए कई कार्यक्रम शुरू किए हैं। संयुक्त राष्ट्र के सहस्त्राब्दी विकास लक्ष्यों में पानी और स्वच्छता को अहतियत दी गई है। इसके तहत सन 2020 तक गंदी बस्तियों में रहने वाले 19 करोड़ लोगों के जीवन में बुनियादी बदलाव लाना है। यूएन के इस प्रयास में यूएन हैबिटेट के साथ ही स्वयंसेवी संस्थाएँ वाटर-एड और भारतीय ग्रामीण महिला संघ सहयोग कर रही हैं।
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