बच्चे अक्सर दवाई खाने से जी चुराते हैं या फिर इंजेक्शन लगाने से घबराते हैं। उन्हें दवा खिलाने में माता-पिता को काफी मशक्कत करनी पड़ती है। लेकिन राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विवि ने इसका इलाज ढूँढ लिया है। बच्चों को कड़वी दवा खाने के बजाए अब लसीली मेडिकेटेड च्युइंगम चबाने को मिलेगी।
यात्रा के दौरान अकसर बीमार पड़ जाने वाले लोगों के लिए भी यह च्युइंगम काफी फायदेमंद हो सकती है। खास बात यह है कि इस च्युइंगम को बनाने वाली मशीन भी आरजीपीवी में ही विकसित की गई है।
इसे विकसित किया है फार्मा विभाग के ही एमफार्मा के छात्र फरहाद मेहता ने। फरहाद ने यह मशीन अपने प्रोजेक्ट के दौरान विकसित की है। इस मशीन को पेटेंट कराने के लिए आरजीपीवी अगले पंद्रह दिनों में आवेदन कर देगा। | | बच्चे अक्सर दवाई खाने से जी चुराते हैं। उन्हें दवा खिलाने में माता-पिता को काफी मशक्कत करनी पड़ती है। लेकिन राजीव गाँधी प्रौद्योगिकी विवि ने इसका इलाज ढूँढ लिया है।
बच्चों को कड़वी दवा खाने के बजाए अब लसीली मेडिकेटेड च्युइंगम चबाने को मिलेगी। |
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फार्मा विभाग के एचओडी प्रो. पियूष त्रिवेदी के अनुसार मेडिकेटेड च्युइंगम बनाने वाली यह मशीन केवल जर्मनी में बनती है। इसकी कीमत करीब 20 लाख रु. है। आरजीपीवी में इसकी लागत मात्र 18 हजार रुपए ही आई है। यदि बाजार में भी यह मशीन उतारी जाती है तो इसकी कीमत ज्यादा से ज्यादा पाँच लाख तक ही जाएगी।
प्रो.त्रिवेदी ने बताया कि मेडिकेटेड च्युइंगम को सबसे पहले इस मशीन पर टेस्ट किया जाएगा। इस मशीन का डिजाइन मनुष्य के जबड़ों जैसा है। इसके अंदर की डिजाइन पूरी तरह मनुष्य के मुँह की तरह बनाई गई है। टेस्ट के दौरान मशीन से यह पता लगाया जाएगा कि च्युइंगम को कितनी बार चबाने से उसके अंदर की दवा घुलेगी तथा चबाने के दौरान कितना तापमान लगेगा।
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