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जूस का सेवन सावधानी से करें
निर्धारित मात्रा में जूस लेना लाभकारी होता है
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जूस के सेवन में सावधानी की जरूरत होती है। वास्तव में किसी भी चिकित्सा को सावधानी से ही लेना चाहिए। प्राकृतिक चिकित्सा भी विशेषज्ञ की सलाह से ही लें। किसी भी समय फल अथवा सब्जियों का रस 200 ग्राम से अधिक नहीं लेना चाहिए। गेहूँ के ज्वारे के रस की शुरुआत आधा कप से करें।

अदरक का रस दस मिलीग्राम से अधिक न हो। इसे भी शहद के साथ ही लें। ज्यूस के स्थान पर फल कच्चे ही खाए जा सकते हैं लेकिन रोगी के लिए ज्यूस से अधिक फायदेमंद कुछ नहीं है। केवल मौसमी फल या सब्जियों पर ही जोर दें। कभी भी आउट ऑफ सीजन फल या सब्जी पर अधिक भरोसा न करें।

फलों और सब्जियों को दो तरह से इस्तेमाल किया जा सकता है। फलों को जहाँ कच्चा खाया जा सकता है वहीं उनका ज्यूस भी बनाकर इस्तेमाल किया जा सकता है। आमतौर पर सब्जियों को पकाकर खाने का चलन है लेकिन औषधि के रूप में उनका रस भी लिया जा सकता है।

उदाहरण के तौर पर करेला, लौकी अथवा घीया की सब्जी भी बनाई जा सकती है वहीं उनका रस भी इस्तेमाल किया जा सकता है। फलों और सब्जियों के रसों में मौजूद विटामिन्स कीटाणुनाशक और रक्त शुद्ध करने के लिए मुफीद होते हैं। इन रसों से शरीर के पाँचों तंत्रों को आराम मिलता है।

कई मरीजों की हालत ऐसी नहीं होती कि वे फलों को चबाकर खा सकें। उनके लिए ज्यूस ग्लूकोस के इंजेक्शन की तरह काम करता है क्योंकि रस बहुत ही कम समय में रक्त में मिल जाता है। फलों का रस शरीर में उपस्थित विजातीय तत्वों को निकाल बाहर करने में बहुत सहायक होता है। विषैले तत्वों के बाहर निकलने के साथ ही उपचार की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। विषैले तत्व बुखार, जुकाम आदि तीव्र रोगों के रूप में बाहर निकलते हैं। आमतौर पर इन्हें विभिन्न औषधियों से 'ठीक' करने की कोशिश की जाती है जबकि फलों अथवा सब्जियों के रस से आँतों की सफाई हो जाती है।

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आमतौर पर फलों के रस के नाम पर बड़े मॉल या डिपार्टमेंटल स्टोर्स में प्रिजर्वेटिव डाला हुआ डिब्बाबंद रस मिलता है। घरों पर फलों का रस बनाने में लोगों की रुचि कम ही रहती है। सच तो यह है कि इन ज्यूसों से फायदे के स्थान पर नुकसान होने की आशंका अधिक रहती है। फलों या सब्जियों के प्राकृतिक रसों से अधिक फायदा होता है। अलग-अलग बीमारियों के लिए विभिन्न तरह के रसों का उपयोग किया जाना चाहिए।
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