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बच्चों में बढ़ती लर्निंग डिसएबिलिटी
लर्निंग डिसएबिलिटी के प्रकार
* पढ़ने में समस्या (डिसलेक्सिया) इसमें पढ़ते समय बच्चा शब्द को ध्यान पूर्वक पूरा करने के बजाए पहले अक्षर के आधार पर शब्द का पूर्वानुमान (अंदाज) लगाता है। इस वजह से धीरे-धीरे पढ़ पाना, शब्द के अक्षरों को भूल जाना, नए शब्द स्वतः जोड़ना, आदि समस्याएँ प्रस्तुत होती हैं।

* लिखने की समस्याएँ (डिसग्राफिया) लिखते समय स्पेलिंग मिस्टेक, अक्षरों का रिवर्सल आदि सामान्य समस्या है। इसके अतिरिक्त वाक्य के निर्माण (सिन्थेसिस), काल (टेन्स) आदि में गलती पाई जाती है।

* गणित संबंधी समस्याएँ (डिसलेक्सिया)- इसमें सामान्य जोड़ने या घटाने आदि में गलतियाँ होती है। चूँकि ऐसे बच्चे में सामान्य बौद्धिक तर्कक्षमता कमजोर होती है अतः इसमें अंदर ऊहापोह और अनिश्चितता अधिक होती है

अभिभावक क्या करें
ऐसी स्थिति में आपको अत्यन्त समझदारी तथा धैर्य रखकर बच्चे की समस्या को समझना चाहिए। बार-बार डाँटना, मारना अथवा अन्य बच्चों से तुलना करना न सिर्फ आपके बच्चे को हतोत्साहित करेंगी, बल्कि उसके सेल्फ कॉन्फिडेन्स पर भी विपरित प्रभाव डालेगी। इसके अतिरिक्त घर के सदस्यों का आपसी सामजस्य भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

स्कूल में बच्चे के साथ होने वाले व्यवहार के प्रति भी सावधानी रखनी चाहिए। भोजन से संबंधित सावधानी ऐसे बच्चों को जहाँ तक संभव हो डिब्बाबंद खाद्य पदार्थ तथा पेय पदार्थ ना दें। इनमें उपस्थित प्रिजर्वेटीव पदार्थनुकसान पहुँचाने वाला हो सकता है।

होम्योपैथी किस तरह है कारग
ऐसी स्थिति में होम्योपैथी अत्यन्त कारगर है। चूँकि होम्योपैथी में व्यक्तित्व विशेषता के आधार पर चिकित्सा की जाती है अतः यह डिसलेक्सीया, डिसग्राफिया, डिसकेलुकुलिया आदि में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। इससे बच्चे के मस्तिष्क के उच्च केंद्र जो सोचने और समझने का कार्य करते हैं में उल्लेखनीय वृद्वि होती है।

बच्चे व्यक्तित्व में पाए जाने वाले विशेष लक्षणों के आधार पर दवा का चुनाव किया जाता है। इसके अतिरिक्त बच्चे को पूर्व में हो चुकी बीमारियाँ तथा परिवार में पाई जाने वाली किसी भी आनुवांशिक बीमारीका भी आंकलन किया जाता है।

इस प्रकार चुनी हुई दवा को जब उचित पोटेंसी तथा बार बार दिया जाता है तब वांछित परिणाम अवश्य प्राप्त होते हैं। इस स्थिति में सामान्यतः उपयोगी दवाएँ लायकोपोडियम, लैकेसिस, स्ट्रामोनियम, मेडोराइनम आदि हैं।
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