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बच्‍चों में टीबी
दिमाग की टीबी दो तरह से होती है। एक मेनिनजाइट्सि के रूप में और दूसरी गठान के रूप में। लक्षण बीमारी की गंभीरता पर निर्भर करते हैं। उपरोक्त लक्षणों के अलावा सिरदर्द होना, उल्टियाँ होना, झटके आना या बेहोश हो जाना साधारणतया दिमागी टीबी की ओर इशारा करते हैं।

खून की जाँच, छाती का एक्सरे, एनटी टेस्ट, कफ की जाँच, गले की गठान की बायोप्सी, इस बीमारी का पता लगाने में सहायक होती है। कुछ नए टेस्ट जैसे पीसीआर और टीबी एंटीबॉडी टेस्ट भी बाजार में उपलब्ध हैं परंतु यह महँगे होते हैं।

टीबी का इलाज अब सरल और सुगम हो गया है। इलाज नियमित रूप से होने पर यह बीमारी मात्र 6 से 9 माह में ठीक हो जाती है। पहले
दिमाग की टीबी दो तरह से होती है। एक मेनिनजाइट्सि के रूप में और दूसरी गठान के रूप में। लक्षण बीमारी की गंभीरता पर निर्भर करते हैं
2 माह (इंटेसिव फेस) में तीन या चार दवाइयाँ दी जाती हैं फिर अगले 4 से 6 माह (कंटुनियस फेस) में दो दवाइयाँ दी जाती हैं। दिमागी टीबीमें इलाज लंबे समय तक चलता है।


टीबी से ग्रसित बच्चों में प्रायः कुपोषण व एनीमिया पाया जाता है। पौष्टिक और संतुलित आहार इलाज में सहायक होता है। बीसीजी का टीका लगवाने से गंभीर किस्म की टीबी से बचा जा सकता है।

टीबी के इलाज के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन और भारत सरकार द्वारा संयुक्त प्रयास से डाट्स पद्धति द्वारा मुफ्त दवा वितरण का कार्यक्रम चलाया जा रहा है। इसके अंतर्गत डॉक्टर/स्वास्थ्य कार्यकर्ता टीबी के मरीज को चिह्नित करते हैं और उसे स्वयं अपने द्वारा मुफ्त दवाइयाँ देते हैं, ताकि मरीज नियमित दवाइयाँ ले। यह दवाइयाँ सरकारी अस्पताल और स्वास्थ्य केंद्रों पर उपलब्ध हैं।

अज्ञानता, पुरानी मान्यताएँ, बढ़ती जनसंख्या, शहरों में झुग्गी झोपड़ियों का विस्तार और एड्स इस बीमारी को महामारी का रूप दे रहे हैं। आज जरूरत है इसके रोकथाम की। बच्चों में टीबी एक सामान्य बीमारी है। पर्याप्त और नियमित इलाज से यह बीमारी शत-प्रतिशत ठीक हो जाती है। इसे समझें और मुकाबला करें।
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