- केतकी शर्मा
समाज के अलग-अलग वर्ग के ये चार लोग एचआईवी पॉजिटिव हैं यानी इन्हें एड्स है लेकिन अपने भविष्य को लेकर ये हमेशा पॉजिटिव (सकारात्मक) हैं। यह सकारात्मकता सिर्फ उन्होंने अपने तक ही सीमित नहीं रखी है बल्कि इस भयानक बीमारी से औरों को बचाने के लिए ये अलख जगाने का काम भी कर रहे हैं। आत्मविश्वास से भरे ये लोग 'विश्वास' संस्था के बैनर तले अपनी बात आम लोगों तक पहुँचाएँगे। हमने इन लोगों से बात की और बीमारी के बाद उनके जीने के सकारात्मक अंदाज को जानने का प्रयास किया।
फिर भी पति है साथ मैं एक ऐसे समाज से हूँ, शिक्षा का अभाव है। बहुपत्नी की प्रथा है। प्रसव के दौरान मैं पॉजिटिव हो गई थी। लेकिन बीमारी की वजह को लेकर मेरे पति ने कभी शंका प्रकट नहीं की। मेरा एक लड़का भी पॉजिटिव है। मुझे पति के प्यार ने जीने का सहारा दिया। वे कम पढ़े-लिखे हैं और ऑटो रिक्शा चलाते हैं। इसके बाद उनकी यह समझदारी से मुझमें हौसला आ गया और मैं लोगों को एड्स के प्रति जागरूक बनाने के काम में जुट गई हूँ। - श्रीमती फारूखी, 36 साल (गृहिणी, आठ साल से पीड़ित)
दुख बाँट खुशियाँ लुटाते हैं मुझे अपनी पत्नी से यह रोग लगा था। उसे बच्चादानी के ऑपरेशन के समय संक्रमित रक्त चढ़ा दिया गया था। मैंने एचआईवी पॉजिटिव मरीजों का एक समूह बनाया है। हम समूह में एक दूसरे से बात कर दुख बाँटते हैं और खुशियाँ लुटाते हैं। मेरे परिवार में सभी लोग जानते हैंकि मैं पॉजिटिव हूँ, मैंने कभी यह नहीं छिपाया। मेरे बच्चे नेगेटिव हैं। मैंने अपनी बेटी की शादी की तो उन्हें भी सचाई बता दी थी। उसका घर बसाने में भी कोई समस्या नहीं आई, वे भी समझदार लोग हैं। -श्री जमुनालाल, 43 वर्ष (व्यापारी, तीन साल से पीड़ित) | समाज के अलग-अलग वर्ग के ये लोग एचआईवी पॉजिटिव हैं लेकिन अपने भविष्य को लेकर ये हमेशा पॉजिटिव (सकारात्मक) हैं। यह सकारात्मकता उन्होंने अपने तक ही सीमित नहीं रखी है बल्कि इस भयानक बीमारी से औरों को बचाने के लिए ये अलख जगाने का काम कर रहे हैं। |
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मौज में लगी बीमारी ड्राइवर था, जिंदगी के मौज किए तो बीमारी तो लगना ही थी। मेरा एक्सीडेंट हुआ तबीयत ठीक नहीं हुई। खुद को लगा कि हो न हो कहीं मैं पॉजिटिव तो नहीं। अस्पताल गया और जाँच कराई। मन नहीं माना तो दुबारा जाँच कराई तो पॉजिटिव आया। समझ गया कि अपनी ही करनी है। घर पर बीवी-बच्चों को बता दिया। तब से ब्रह्मचर्य ले लिया।
मुझे देखकर लोगों को आश्चर्य होता है कि मैं पॉजिटिव हूँ। ड्राइवरी करता था तो बस अब ड्राइवरों के बीच जाकर उन्हें एड्स के बारे में बताता हूँ। जो पॉजिटिव हैं और डरे हुए हैं, उनमें पॉजिटिवएनर्जी से भरता हूँ। -श्री बहादुर, 51वर्ष, (ट्रांसपोर्ट संचालक, दस साल से पीड़ित)
अब भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं अब भी मुझे वो दिन याद आते हैं तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं। रोज रात को दरवाजे खटखटाने की आवाज आने लगती थीं। मैंने पहले कुछ जवाब नहीं दिया लेकिन एक दिन ऐसा लगा कि बस दरवाजा टूटने वाला है, मुझे खुद से ज्यादा तीनों लड़कियों की चिंता होने लगी। तभी अचानक हिम्मत आई और मैंने चिल्लाना शुरू किया। आवाज आना बंद हो गई। अगले दिन झगड़ा थाने तक पहुँच गया।
मोहल्लेभर को पता चल गया। लेकिन, तब से मुझमें हिम्मत आ गई। बच्चों के पैदा होने के बाद पति पॉजिटिव हुए थे। तब, मैं घबरा गई थी पर अब मुझे किसी बात का डर नहीं। यह एक ऐसा घटनाक्रम है जो पॉजिटिव होने के बाद में लोगों को बताकर प्रेरणा देती हूँ। पेट भरने के लिए दोने बनाती हूँ, नौकरी करती हूँ और बचे समय में एड्स पीड़ितों के लिए काम करती हूँ। - श्रीमती सरिता, उम्र 32 साल, (नौकरीपेशा महिला, दो साल से एचआईवी एड्स से पीड़ित)
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