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बातें करें स्‍वस्‍थ रहें
- विवेक कुमा

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क्या यह सुनने-सुनते आपके कान पक गए हैं कि ज्यादा बातें करना अच्छी बात नहीं? ...तो यह भी सुन लीजिए कि वैज्ञानिकों ने यह पाया है कि बातें करने से आपका दिमाग तेज होता है और मानसिक स्वास्थ्य बढ़िया रहता है।

माना जाता है, बातें बनाना बुरी बात है। लोग अक्सर कहते भी हैं, इस तरह बातें बनाने से बात नहीं बनेगी। लोग बातूनी लोगों को अक्सर व्यंग्य से इस तरह वाक्‌पटु कहते हैं मानो उन्हें चिढ़ा रहे हों। लेकिन बातें बनाना या ज्यादातर लोगों से संवाद स्थापित कर लेना न तो किसी बेवकूफी की निशानी है और न ही इससे कोई नुकसान है। भले ही लोग कहते हों कि बातें बनाने से कुछ नहीं होगा, मगर वैज्ञानिकों ने एक विस्तृत शोध के जरिए साबित किया है कि बातें बनाना न सिर्फ बुद्धिमान बनने का जरिया है, बल्कि निरंतर और हर तरह के लोगों से संवाद कला में माहिर होने वाले लोग जीनियस भी साबित होते हैं।

मिशिगन यूनिवर्सिटी (अमेरिका) ने एक विस्तृत शोध में पाया है कि जब आप रोजाना 10 मिनट किसी के साथ किसी भी विषय पर बातचीत करते हैं तो इससे न केवल आप धीरे-धीरे संवाद कला में माहिर होते जाते हैं, बल्कि इससे याददाश्त भी तेज होने लगती है और बुद्धिमत्ता भी बढ़ने लगती है। इस तरह याददाश्त और बुद्धिमत्ता को सक्रिय बनाए रखने के लिए लोगों के साथ बातचीत करना जरूरी है। यहाँ तक कि वर्ग पहेलियाँ भी इसके मुकाबले कम असरकारक हैं।

इंस्टीट्यूट फॉर सोशल रिसर्च ऑफ मिशिगन यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिक ऑस्कर याबरी, जो इस शोध के साथ जुड़े थे, उनके मुताबिक दिमागी कसरत स्वास्थ्य के लिए उतनी ही जरूरी है जितनी जिस्मानी कसरत। दिमागी कसरत का सबसे आसान और उर्वर तरीका है विभिन्न किस्म के लोगों के साथ प्रतिदिन कम-से-कम 10 मिनट बातचीत करना। शोध में मनोवैज्ञानिकों ने पाया है कि मानसिक कार्यप्रणाली और सामाजिक व्यवहार में सीधा संबंध होता है। इसलिए अगर सामाजिक रूप से आप सक्रिय रहते हैं तो मानसिक रूप से भी स्वस्थ और सक्रिय रहते हैं। इसे साबित करने के लिए बड़े पैमाने पर शोध किया गया और जो लोग प्रतिदिन या हफ्ते में कम-से-कम 4 बार नियमित रूप से लोगों के साथ 10 से 20 मिनट का संवाद स्थापित करते थे, वे बुद्धिमान और मानसिक रूप से ज्यादा सचेत पाए गए, बनिस्बत उन लोगों के, जो लोगों से मिलने-जुलने और संवाद करने से कतराते हैं तथा अपने आप में ही मस्त रहते हैं। शोध में यह भी साबित हुआ कि संवाद करने में उदासीन रहने वाले लोग, फिर चाहे वे प्रखर वैज्ञानिक ही क्यों न हों, उनकी याददाश्त कमजोर हो जाती है। यह महज संयोग नहीं है कि दुनिया के ज्यादातर महान वैज्ञानिकों को कमजोर स्मृति का शिकार पाया गया है।
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