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जानकारी ही बचाव है...
-डॉ. वीपी पांड

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एचआईवी वायरस को लेकर अब भी समाज में काफी भ्रांतियाँ हैं। इन्हें दूर करके वायरस को हमेशा के लिए खत्म करने में मदद ली जा सकती है। इस वायरस से डरने की नहीं, बल्कि सही परिप्रेक्ष में समझने की जरूरत है। विकसित देशों में यह वायरस तेजी से कम होता जा रहा है। हमारे देश में भी एचआईवी मरीजों की संख्या को लेकर काफी भयावह अनुमान लगाए जा रहे थे लेकिन अब सभी दावे खोखले साबित होते जा रहे हैं। अब जो नई दवाएँ आ रही हैं उनसे मरीजों को नया जीवन मिल रहा है। अभी कुछ चुनिंदा दवाओं की कीमतें बहुत अधिक हैं लेकिन आम जन को एआरटी सेंटर्स के माध्यम से मुफ्त में उपलब्ध कराई जा रही हैं।

एड्स एवं एचआईवी का भयावह वायरस 1982 से शुरू हुआ था। तब से अब तक लोगों में इस रोग की बढ़ती समझ के कारण यह वायरस अब कमजोर पड़ता नजर आ रहा है। विकसित देशों में इस वायरस से ग्रस्त नए मरीजों की संख्या में बहुत तेजी से कमी आई है। अमरीक, योरप के कई देशों में तो इसके लिए स्थापित अस्पतालों के कई यूनिट बंद भी हो गए हैं। भारत में अभी भी इसके कई केंद्र हैं। यहाँ मरीजों को इलाज के साथ काउंसिलिंग भी की जा रही है।

क्या खासियत है इस वायरस की?

एचआईवी का आर.एन.ए. वायरस पूरी तरह से सिर्फ मानव जाति पर निर्भर है। यह हवा से या साधारण संपर्क से बिलकुल नहीं फैलता। दूसरे व्यक्ति के शरीर में जाने के लिए इसे द्रव्य या रक्त का संपर्क जरूरी होता है। अगर दूसरे किसी से संपर्क न हो तो यह वायरस एक ही मरीज के शरीर में रहते हुए मरीज के साथ ही समाप्त हो जाता है।

वायरस की इस विशेषता से क्या फायदा उठा सकते हैं?

वायरस की इसी विशेषता का फायदा उठाते हुए यह माना जा सकता है कि यदि मरीज किसी भी दूसरे को संक्रमित न कर पाया हो तो मरीज के साथ संतुलित व्यवहार रखते हुए सुरक्षित रहा जा सकता है।

भारत में इतने एड्स रोगी क्यों?

हमारे देश में निरक्षरता, अज्ञानता एवं एड्स से फैलने के कारणों पर खुलकर चर्चा न कर पाना इसके फैलने का एक मुख्य कारण रहा है। फिर भी इस वर्ष यह माना गया है कि एड्स के रोगी हमारे यहाँ उतने नहीं हैं जितने दो वर्ष पूर्व सोचे जा रहे थे। नाको के अनुसार पूर्व में लगभग 60 लाख मरीजों के होने का अनुमान था, लेकिन वर्तमान में लगभग 26 लाख मरीज ही सामने आए हैं।
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