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चालीस के बाद चौकन्‍ने
-डॉ. योगेश शा

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चालीस की उम्र पार करने के साथ ही कई समस्याएँ शुरू हो जाती हैं लेकिन उनका असर देर से सामने आता है। बेहतर तो यही होता है कि बीमारी के आने से पहले ही उससे सतर्क रहते हुए सावधानी रखी जाए। कई बीमारियाँ ऐसी होती हैं जो उम्र बढ़ने के साथ ही शरीर में घर करती जाती हैं। चालीस के होते ही यह तय करना चाहिए कि हर साल पूरे शरीर की सभी जाँचें और परीक्षण करा लें। खान-पान की आदतें बदलें और अनुशासन तथा संयम के रहने की आदत डाल लें।

वैसे तो अपनी सेहत के प्रति सभी को सदैव जागरूक रहना चाहिए, परंतु फिर भी उम्र का चालीसवाँ पड़ाव इस मामले में जागने का सबसे जरूरी व उचित समय है। इस आयु में जहाँ व्यक्ति अपने करियर व गृहस्थी के मामले में सेटल होने लगता है, वहीं कार्य का दबाव बच्चों के भविष्य की चिंता, जीवन में स्थायित्व लाने का तनाव आदि उसके स्वास्थ्य के लिए 'स्ट्रेस' का काम करते हैं, साथ ही शरीर युवावस्था की सक्रियता व ऊर्जा से वंचित होने लगता है। विभिन्न शारीरिक क्रियाएँ व मांसपेशियों की मजबूती कम होने लगती है, अतः इस अवस्था के आने के पहले ही जागना जरूरी है। याद रखें यदि आपके स्वास्थ्य में सेंध लग गई तो आप न केवल उस परिवार पर बोझ बन जाएँगे जो आप पर निर्भर है बल्कि आप उस आराम और सुकून से भी वंचित हो जाएँगे जिसे हासिल करने के लिए आपने जी-तोड़ मेहनत की है। इसलिए जरूरी है कि आप उन चेतावनी के संकेतों, अलार्म सिग्नल्स को पहचानें और साथ ही अपनी सेहत को बरकरार रखने के लिए सावधानियाँ बरतें।

जीवनशैली में परिवर्त

अपनी उम्र व क्षमता के हिसाब से अपने रहन-सहन, खान-पान व दिनचर्या को ढालें, यह सबसे जरूरी है। जीवनशैली का स्ट्रेस या दबाव, तनाव व सीडेन्ट्री लाइफ स्टाइल यानी शारीरिक श्रम रहित जीवनशैली से गहरा संबंध है। इन दोनों कारणों से आप भविष्य में उच्च रक्तचाप (ब्लडप्रेशर), हृदयरोग, मधुमेह (डायबिटीज), डिप्रेशन (अवसाद), पोश्चर व जोड़ों की समस्याओं से पीड़ित हो सकते हैं। इसलिए आवश्यक है कि जीवन में कुछ नियमित व्यायामों को स्थान दें, सुबह-शाम 4 किमी की पैदल सैर करें या तैरने जाएँ और साथ ही स्ट्रेस को भी कम करें। इसके लिए योग व ध्यान एक अच्छा साधन है। स्ट्रेस उत्पन्न करने वाले कारकों को पहचानें व उन्हें दूर करें, जैसे अपने आर्थिक लक्ष्य ऐसे तय करें जिन्हें आप हासिल कर सकें, अपने खर्चों की योजना अपनी आर्थिक सीमाओं को ध्यान में रखकर बनाएँ। कर्ज लें तो उसके उतारने की क्षमता का पहले ध्यान रखें। परिवार को समय दें, कभी-कभी उनके साथ मनोरंजन व परिवर्तन के लिए बाहर जाएँ और इस समय अपने कामकाज व कारोबार की चिंताओं को घर छोड़ दें।

नियमित जाँचे

प्रौढ़ावस्था के दौरान शरीर अनेक परिवर्तनों से रूबरू होता है। महिलाओं में जहाँ इस दौरान रजोनिवृत्ति व इससे जुड़े हॉर्मोनल परिवर्तन होते हैं, वहीं पुरुषों में भी कई रासायनिक परिवर्तन होते हैं। डायबिटीज टाइप-2 जैसी अनुवांशिक बीमारी भी इस दौरान प्रकट होती है, बरसों से धमनियों में जमा कोलेस्टेराल व फेफड़ों में जमा सिगरेट के धुएँ से निकला कार्बन हृदयाघात, दमा व ब्रोन्काइटिस जैसी समस्याओं को जन्म दे सकता है। कैल्शियम की कमी व शारीरिक व्यायाम रहित जीवन शैली आर्थराइटिस (संधिवात) को साथ लाती है। पढ़ने के लिए चश्मा लगने की उम्र भी यही है। इसलिए जरूरी है कि 40 वर्ष की आयु में आप कम-से-कम एक बार सभी जरूरी जाँचें व चिकित्सकीय परीक्षण अवश्य करा लें। इन जाँचों से जहाँ एक ओर यदि शरीर के भीतर कोई समस्या जन्म ले रही होगी तो वह पकड़ में आ जाएगी और उसे आगे बढ़ने से रोका जा सकेगा।

वहीं जाँच की रिपोर्ट्स भविष्य के लिए आधार या बेसलाइन का काम करेगी जिनसे भविष्य में की गई जाँच की रिपोर्ट की तुलना कर निष्कर्ष निकालने में आपके डॉक्टर को सहायता मिलेगी। जरूरी जाँचों में लिपिड प्रोफाइल, ब्लड यूरिया, सीरमक्रिएटिनीन, लीवर फंक्शन टेस्ट, ईसीजी, चेस्ट एक्स-रे, एब्डोमिनल सोनोग्राफी, टीएमटी (ट्रेडमिल टेस्ट), यूरिन व कम्पलीट हीमोग्राम साथ ही महिलाओं के लिए बोनमेरो डेन्सिटी (बीएमडी), सरवाइकल पेप स्मीअर व मेमोग्राफी आदि जाँचें सामान्यतया कम से कम एक बार करवाकर रखना चाहिए। यदि परिवार में डायबिटीज की हिस्ट्री है तो 45 वर्ष की उम्र तक दो वर्ष में एक बार और फिर प्रत्येक वर्ष खून में शकर की जाँच जरूरी है। इसी प्रकार परिवार में स्तन कैंसर पहले हुआ हो तो महिलाओं को साल में एक बार मेमोग्राफी अवश्य कराना चाहिए। वर्ष में एक बार आँखों की जाँच फंडोस्कोपी व कानों की जाँच भी करा सके तो अच्छा है। इसके अलावा साल में एक बार अपने डॉक्टर से अपना पूर्ण परीक्षण कराएँ और जो जाँचें वे जरूरी समझें, उन्हें कराएँ।

खान-पा

खान-पान में संयम इस आयु की एक और खास आवश्यकता है। अपने वजन पर खास ध्यान दें। घी, तेल, चिकनाईयुक्त और मीठे भोज्य पदार्थों से यथासंभव बचें, नमक भी सीमित मात्रा में लें, कच्चा नमक न खाएँ तो भी हर्ज नहीं। भोजन में पर्याप्त मात्रा में हरी सब्जियाँ, सलाद व अन्य रेशेदार पदार्थ लें। अंकुरित मूँग, चने व फलों का रस नाश्ते में शामिल करें। कई लोग इस उम्र में अपने मन से ही विटामिन्स व एंटी-ऑक्सीडेंट्स की गोलियाँ लेने लगते हैं। इससे सिर्फ इन महँगी दवाओं को बनाने वाली कंपनियों को ही लाभ होता है व्यक्ति को नहीं। एक संतुलित आहार से इन सभी की पूर्ति प्राकृतिक रूप से हो जाती है।
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