मुख्य पृष्ठ > विविध > सेहत > यूँ रहें स्वस्थ
सुझाव/प्रतिक्रिया मित्र को भेजियेयह पेज प्रिंट करें
 
अल्जाइमर से मुक्ति है संभव?
NDND
-रामकिशोर पारच

कैलिफोर्निया (अमेरिका) के दक्षिण स्थित सेनफ्रांसिस्को एलन फार्मास्युटिकल्स के डेल शेंक और उसके सहयोगियों ने एक ऐसी दवाई तैयार की है, जो याददाश्त को प्रभावित करने वाले रोग अल्जाइमर में मदद करेगी। एक नए प्रकार के विकसित जीन द्वारा चूहों में अल्जाइमर रोग जैसे लक्षणों की बढ़ोतरी पर इस दवा के प्रयोग काफी कारगर सिद्ध हुए हैं।

अल्जाइमर पार्किंसन रोग से भी खतरनाक, एक सतत रूप से बढ़ने वाला, नाड़ियों को प्रभावित करने वाला ऐसा रोग है, जिसका प्रमुख लक्षण है याददाश्त में कमी। यह अधिकतर वृद्धावस्था में होता है, परंतु वंशानुगत प्रभाव होने पर युवा भी इससे प्रभावित हो सकते हैं। अल्जाइमर के रोगियों के मस्तिष्क में विभिन्न अवस्थाओं की एक श्रृंखला-सी चलती है, जिससे पहले दिमागी न्यूट्रॉन्स नष्ट हो जाते हैं, विशेषकर उन भागों में, जो नई चीजों को सीखने और स्मरण-शक्ति से जुड़े होते हैं। मस्तिष्क की कोशिकाओं के अंदर ही 'ताऊ' नामक प्रोटीन्‍स का उलझ जाना और सबसे महत्वपूर्ण रूप से कोशिकाओं के बाहर ड्रिफ्ट या एमीलायड प्लेक का 'एमीलायड बेटा' नामक प्रोटीन के रूप में एकत्र होना भी इस रोग का कारण होता है। प्रोटीन का यह भाग एक बड़े प्रोटीन के विघटन से बनता है, जिसकी साधारण उपयोगिता अभी तक अज्ञातहै। कोई भी ठीक से नहीं जानता कि ये एमीलायड प्लेक (ए) अल्जाइमर के पागलपन के लक्षणों के कारण आते हैं या इस रोग के प्रभाव के साथ यूँ ही प्रकट हो जाते हैं, परंतु इस 'ए' के कुछ प्रकारों को मस्तिष्क के न्यूट्रॉन के प्रति बहुत ही विषैला पाया गया है। साँस रोक देने वाली साधारण प्रयोगों की एक श्रृंखला में शेंक और उनके सहयोगियों ने 'ए' को टीके द्वारा चूहों में डाल दिया और फिर ल्जाइमर के विकास और बढ़त की प्रतीक्षा की। ये चूहे कोई साधारण चूहे नहीं थे क्योंकि इन्हें बहुत से प्रयोगों के बाद मानवीय जीनों के साथ 'ए' प्रोटीन के प्रति परिवर्तित जीनों के विकास से तैयार किया गया था। आमतौर पर ये चूहे अल्जाइमर रोग के एक प्रकार का विकास कर लेते हैं, जिसमें एमीलायड प्लेक का विकास होता है परंतु 'ए' से टीकाकरण किए हुए युवा चूहों ने अपने बाद के जीवन में एमीलायड प्लेक के विकास के कोई लक्षण नहीं दिखाए।

बूढ़े चूहों, जिनमें एमीलायड का विकास पहले से ही प्रारंभ हो चुका था, को भी दवा से लाभ पहुँचा। अभी तक वैज्ञानिक यह नहीं जानते हैं कि दवा के प्रभाव की प्रक्रिया कैसे काम करती है। संभव है कि 'ए' के विरोध में विकसित किए गए एंटी बॉडी तत्व केंद्रीय नाड़ी तंत्र से प्रोटीन को पहले ही साफ कर देते हों, जिससे प्लेक के उत्पन्न होने की कोई संभावना ही न रहती हो। तो इसके अर्थ है कि शीघ्र ही मनुष्य के लिए भी अल्जाइमर रोग की किसी दवा की खोज हो सकती है। हमेशा की तरह विज्ञान का इस विषय में उत्तर 'हाँ' और 'न' है क्योंकि एक समस्या यह भी है कि जीनों की तकनीक से बनाए गए चूहों में भी यह पूरी तरह से इंसानी अल्जाइमर की तरह नहीं है, यद्यपि चूहों में भी एमीलायड प्लेक के लक्षण देखने को मिलते हैं परंतु न्यूरोफाइब्रिलरी उलझाव और स्नायुओं का धीरे-धीरे नष्ट होना उनमें शामिल नहीं है।

इसलिए यह भी संभव है कि 'ए' द्वारा टीकाकरण किए हुए मनुष्यों में एमीलायड प्लेक न उत्पन्न हों, परंतु उनमें इस रोग के अन्य लक्षण आ जाएँ। ऐसा कोई परिणाम खतरनाक हो सकता है। फिर भी वह उपयोगी होगा, क्योंकि उससे यह तय करने में आसानी होगी कि अल्जाइमर रोग का कारण या उसका प्रभाव क्या होता है। दूसरी ओर यह भी संभव है कि यह दवा कारगर साबित हो और अल्जाइमर के सभी लक्षणों को पूरी तरह मिटा दे जिससे इस रोग से पीड़ित लाखों लोगों को नया जीवन मिल सके।
और भी
जब बढ़ने लगे खून का दवाब
एलर्जिक रायनाइटिस साधारण सर्दी नहीं
मधुमेह रोगी तथा यात्रा
बच्‍चे हों जब कान दर्द से परेशान
खान-पान पर कसें लगाम
किशोरावस्था के रोग कील-मुँहासे