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खान-पान पर कसें लगाम
-चन्द्रमणि शर्मा 'पथिक'

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वर्तमान में व्यस्तता का सबसे अधिक असर भोजन पद्धति पर ही पड़ा है। इसने आहार प्रक्रिया को तहस-नहस कर डाला है, जबकि जीवन को स्वस्थ एवं निरोगी बनाए रखने में आहार महत्वपूर्ण तत्व है। शरीर की अधिकतम बीमारियाँ असंगत आहार से ही पनपती और बढ़ती हैं। इसलिए आहार संयम स्वास्थ रक्षा का मूल आधार है। लेकिन भौतिकवाद की अति में हमने आज तो यह बात जैसे पूरी तरह भुला दी गई है। फैशन, स्वाद एवं सुविधाओं के कारण ऐसे आहार का प्रचलन बढ़ रहा है, जो स्वास्थ्य की दृष्टि से अत्यंत हानिकारक है।

जिस देश में बिकने वाले पीने के पानी तक की शुद्धता की गारंटी नहीं दी जा सकती, वहाँ खाने-पीने की जो चीजें डिब्बों में बंद की जाती हैं उनका तो ईश्वर ही मालिक है। इनमें एथिल सोडियम क्लोराइड, एसिटिक एसिड तथा ऐसे कई तत्व मिलाए जाते हैं। जिस एक खास मिश्रण का प्रयोग सबसे अधिक मात्रा में किया जाता है, वह है प्रिजरवेटिव। इसके अलावा फास्ड फूड का चलन जिस तेजी से पनपा है, उसी तेजी से उसकी कमियाँ भी उजागर हुई हैं। फास्ट फूड यानी बर्गर, सैंडविच, चाऊमिन आदि कई बार बीमारियों को जन्म देते हैं।

चूँकि ऐसी चीजें ज्यादातर मैदे से बनाई जाती हैं, अतः इनमें रेशे का नामोनिशान नहीं होता। अध्ययनों से पता चला है कि मैदे से निर्मित चीजें जरूरत से ज्यादा खाने से आँतों में चिपक जाती हैं। कुछ चिकित्सकों ने तो इसके जमने की तुलना सीमेंट से की है। जिस तरह से सीमेंट को जमने के बाद छुड़ना आसान नहीं होता, उसी प्रकार मैदे से बनी चीजें आँतों में जम जाती हैं फलस्वरूप पित्त की थैली में पत्थरी, हृदय रोग,बद्धकोष्ठ, मधुमेह, आँतों का कैंसर तथा बवासीर जैसे रोगों के होने की संभावना बलवती हो जाती है।

याद रखिए आहार इंसानी जिंदगी की निहायत अनिवार्य आवश्यकता है। इसके महत्व को समझते हुए इसकी पूर्ति उचित तरीके से ही की जानी चाहिए। इस क्रम में हरी सब्जियों का अधिक उपयोग किया जा सकता है। यदि हम ध्यान दे सकें तो ऐसा नहीं है कि फास्ड फूड के विकल्प हमारे पास मौजूद नहीं हैं। आवश्यकता है बस थोड़ी सजगता और स्वचेतना की। भोजन मात्र पेट भरने की वस्तु न होकर शारीरिक पोषण के लिए भी आवश्यक है। चिकित्सकीय मत 'चिकित्सा से बेहतर है बचाव' को ध्यानांतर्गत रखकर उचित आहार का ही सेवन कीजिए एवं प्रकृति से परे मत जाइए।
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