किशोरावस्था शुरू होते ही शरीर में हार्मोन्स सक्रिय होने के कारण कई परिवर्तन होते हैं। त्वचा के नीचे सिबेसियस ग्लांड्स एक तैलीय पदार्थ बनाती है जो हमारी त्वचा की प्राकृतिक चमक एवं स्वास्थ्य के लिए अत्यावश्यक होता है। जब इन ग्रंथियों में तैलीय पदार्थ अत्यधिक मात्रा में बनने लगता है तो वह जमकर कील का रूप धारण कर लेता है।
आज के वैज्ञानिक युग में जहाँ चिकित्सा के नए-नए तरीके उपलब्ध हैं, वहाँ एक आम व्यक्ति भी अपने स्वास्थ्य के प्रति पहले से कहीं अधिक जागरुक हो गया है। आजकल किशोरावस्था प्रारंभ होते ही बहुत से लोग कील-मुँहासों से पीड़ित होने लगते हैं। और यह उनके लिए एकचिंता का कारण बन जाता है।
कील-मुँहासे हमारे माथे, गालों, गर्दन, छाती, पीठ आदि जगहों पर काले बिन्दु के रूप में, लाल रंग के उभार के रूप में या फुंसी के रूप में पाए जा सकते हैं। ये दिखने में काफी अप्रिय होते हैं और साथ-साथ इनमें कुछ दर्द, खारिश या जलन भी हो सकती है।
हमारी त्वचा में कुछ ग्रंथियाँ तो पसीने के लिए होती हैं। जो शरीर का तापमान नियमित करने में सहायक होती हैं। इसके साथ-साथ कुछ अन्य ग्रंथियाँ भी होती हैं जिन्हें हम सिबेसियस ग्लांड्स कहते हैं। ये ग्रंथियाँ एक तैलीय पदार्थ बनाती हैं जो हमारी त्वचा की प्राकृतिकचमक एवं स्वास्थ्य के लिए अत्यावश्यक होता है। ये ग्रंथियाँ पैरों के तले, हथेली एवं ऊपरी पलकों को छोड़कर सारे शरीर में विद्यमान होती हैं। इन ग्रंथियों की संख्या सिर, चेहरे, गर्दन, छाती एवं पीठ पर अधिक होती हैं। कील-मुँहासे इन्हीं ग्रंथियों की एक बीमारी है।
|