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पैरों की देखभाल यूँ करें
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- डॉ. अनिल भदौरिय

मधुमेह के रोग
मधुमेह, विभिन्न अवस्थाओं में निरंतर पैरों के पंजों को प्रभावित करता है और तेजी से पंजों की संवेदना कम होकर समाप्त हो सकती है। सामान्यतः मधुमेह रोगी अपने पंजों की समस्याओं पर ध्यान नहीं देते हैं तथा संवेदन शून्य होने के कारण दर्द का अहसास भी नहीं होने पाता है। यही अवहेलना पंजों में चोट का कारण बनती है और एक छोटी-सी चोट भी संक्रमण को बढ़ाकर सड़न में बदल सकती है। इससे अंगुली, पंजे या पाँव के निचले हिस्से सड़ सकते हैं। ऐसी अवस्था में अंतिम उपाय के तौर पर अंग ही काटना पड़ता है।

इस तरह करें पैरों की सुरक्ष
अपने पंजों व पैरों की प्रतिदिन जाँच करें। उँगलियों के बीच की जगह पर विशेष ध्यान दें। देखें कि कहीं छाला, स्क्रेच, क्रेक या त्वचा में रंग बदलाव तो नहीं है।

एड़ी में होने वाली फिशर/क्रेक से बचने के लिए गुनगुने पानी में एड़ी को रखें। गर्म पानी का तापमान कोहनी की त्वचा पर जाँचें। दस मिनट तक पानी में रखने के बाद एड़ी के कठोर क्षेत्र को नर्म तौलिए से अथवा घिसटन-पत्थर से घिसें, पश्चात मृदु साबुन से धोएँ। पूर्णतः सूखने के बाद एड़ी के चारों ओर तेल या क्रीम लगाएँ।

अत्यधिक गर्म या अत्यधिक ठंडे तापमान से बचें। गर्म व तेज धूप की अवस्था में नंगे पैर न चलें। यहाँ तक कि मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे अथवा फुटपाथ पर नंगे पैर न चलें।

रात में यदि पैरों में अधिक ठंड लगे तो कॉटन या ऊनी जुराबें पहनें।

हमेशा सही तौर से फिट होने कॉटन जुराबें प्रयोग में लाएँ। प्रयास करें कि चप्पल/ सेंडल पहनने से बेहतर चमड़े के या केनवास के स्पोर्ट्स शूज पहने जाएँ।

जुराबें व जूते पहनने से पहले सदैव जाँच करें कि कोई बारीक कंकड़/ पत्थर/ सूत/ आदि भीतर न हो। जूते-मोजे उतारने के बाद पैर की जाँच करें कि कहीं कोई घाव/ चोट तो नहीं हो गई है।

जब बैठें तो पालथी मारकर न बैठें। इससे पैरों की रक्त वाहिनियों तथा तंत्रिका तंत्र पर अत्यधिक दबाव पड़ता है।

याद रखें मधुमेह पूर्णतः ठीक हो सकने वाला रोग नहीं है, किंतु इसका नियंत्रण व इलाज संभव है। रक्त में समुचित शर्करा नियंत्रण द्वारा पंजों को जटिलताओं से बचाया जा सकता है।

अपने फेमिली/ विशेषज्ञ चिकित्सक के संपर्क में सदा रहें, ताकि आप पैरों में दर्द, त्वचा-रंग-परिवर्तन या जलन, सुई-चुभन व झुनझुनी जैसे लक्षणों को समय पर पहचान कर अच्छे से समुचित रोगोपचार लें सकें।
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