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पैदल चलें, सेहत बनाएँ
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-डॉ. ओमप्रकाश शुक्

टहलने से शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन मिलती है। टहलने में जो शारीरिक श्रम करना पड़ता है, उसमें पसीना बहुत निकलता है, इस प्रकार पसीने के मार्ग से शरीर में संग्रहीत विजातीय द्रव्य भी निकल जाता है। हम लोग जो आहार ग्रहण करते हैं, उसमें बहुत से रासायनिक पदार्थ शरीर को उपलब्ध होते हैं, अतः शरीर को स्वस्थ रखने के लिए आवश्यक है कि उनमें जो शरीर के लिए अनपेक्षित अंश हैं, वे निकल जाएँ। पसीना इसका बड़ा सशक्त साधन है, अतः टहलना हमें दोहरा लाभ पहुँचाता है।

प्रातः काल टहलने से मनुष्य को आरोग्यता प्राप्त होती है क्योंकि सुबह स्वच्छ, शुद्ध वायु का पान करने को मिलता है। साथ ही शरीर के समस्त अंग क्रियाशील हो जाते हैं और उन्हें घूमते हुए शुद्ध वायु की प्राप्ति होती है जो मन और शरीर को हल्का करती है। इसकी प्रशंसा में ऐतरेप ब्राह्मण का एक मंत्र है-

कलिः शयानो भवति संजिहानुस्त द्वापरः।

उत्तिष्ठंस्त्रोता भवति कृतं संपद्यते चरन्‌॥

निद्रा लेने वाला व्यक्ति कलयुगी है निद्रा त्यागने वाला द्वापरयुगी है, खड़ा रहने वाला त्रेतायुगी, चलने-फिरने वाला कृतयुगी है। कृतयुग के व्यक्ति के गुणों की चर्चा करते हुए चरक ने कहा है-

'आरोगाः सर्व सिद्धार्थाश्चतर्वर्ष शताः युषः।

कृते त्रेतादिषु ह्योषह्युर्हृसति॥'

तात्पर्य स्पष्ट है कि चलने-फिरने वाला व्यक्ति रोगमुक्त, सर्वसिद्धियों को प्राप्त करने वाला होता है।

पैदल चलना वर्ण, कफ, स्थूलता और सुकुमारता को नष्ट करता है। जितना चलने से शरीर को अधिक कष्ट न हो उतना चलना आयु, बल, मेधा और अग्नि को बढ़ता है तथा इन्द्रियों को सचेष्ट करता है।
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