आधुनिक जीवनशैली और अनियमित खानपान के कारण युवाओं में एसिडिटी की समस्या आम है। आयुर्वेद में इसे समूल नष्ट करने के लिए औषधियाँ सुझाई गई हैं। औषधियां तात्कालिक तौर पर भले ही पेट की जलन से छुटकारा दिला दें लेकिन एसिडिटी कभी न हो इसके लिए जिंदगी से तनाव को हमेशा के लिए दूर रखा जाए साथ ही जीवन शैली भी इस तरह बनाई जाए जो न सिर्फ एसिडिटी बल्कि दूसरे अन्य रोगों की चपेट में भी न आने दे।
आयुर्वेद में एसिडिटी अम्लपित्त के नाम से वर्णित की गई है। यह रोग, रोगी के आहार या भोजन की अनियमितता एवं मानसिक तनाव के रहने के कारण होने वाला रोग है। अम्लपित्त रोग को औषध के साथ-साथ इसके कारणों को दूर करके नष्ट किया जा सकता है।
आयुर्वेद में अम्लपित्त (एसिडिटी) के कारण पित्त को बढ़ाने या प्रकुपित करने वाले अन्ना (अधिक मिर्च-मसाले वाले पदार्थ, अत्यधिक मद्यपान, नवीन चावल आदि) अधिक समय से निरंतर सेवन करते रहना या अधिक सेवन करने से एसिडिटी होती है।
* भोजन का समय पर न करना। * अजीर्ण होने पर भी गरिष्ठ भोजन करना। *भोजन करने के बाद दिन में सोना। * भोज्य पदार्थों का भोजन के अतिरिक्त दिन में अत्यधिक बार-बार सेवन करते रहना। * अधिक समय तक मानसिक तनावग्रस्त। * अधिक समय तक बार-बार भूखे रहना।
एसिडिटी के सामान्य लक्षण एसिडिटी होने के साथ ही सबसे पहले पेट में जलन होने लगती है। अपच रहता है और कड़वी तथा खट्टी डकारें आने लगती हैं। पेट में एसिड बढ़ने के कारण तीव्र सिरदर्द की भी शिकायत हो जाती है।
* भोजन का पाचन न होना। *कड़वी एवं खट्टी डकार आना। * गले या छाती में जलन होना। * शरीर व सिर में भारीपन। * भोजन में रुचि न होना।
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