फिजियोथैरेपी का हड्डी जुड़ने की प्रक्रिया में विशिष्ट एवं वैज्ञानिक स्थान है। प्लास्टर लगने के बाद हड्डी जुड़ने की प्रक्रिया को बल मिलता है, क्योंकि टूटने के स्थान पर कैल्शियम का जमाव होना आवश्यक है और इसी प्रकार हड्डियों के 2 टूटे सिरे आपस में जुड़तेहैं। इस पूरी प्रक्रिया में अस्थियों के आसपास मौजूद माँसपेशियाँ प्लास्टर के भीतर कार्यहीन अवस्था में बिना संकुचन के शिथिल पड़ी रहती हैं।
प्लास्टर के कटते ही रोगी अपनी पुरानी शक्ति को पुनः हासिल करना चाहता है और इस मौके पर फीजियोथेरेपी कारगर साबित होती है। मांसपेशियों की अशक्त स्थिति को ठीक करना तथा टूटे हुए अंग की संकुचित हो चुकी गति-चाल (रेंज ऑफ मूवमेंट) को पूर्व कार्य अवस्था में लाना ही फिजियोथैरेपी का काम है। 3-6 सप्ताह के दौरान बंधन की अवस्था में रहे अस्थि-जोड़ को अपनी पूर्व शक्ति को प्राप्त करने के लिए माँसपेशियों की कसरत जरूरी होती है। इसके लिए मांसपेशियों को 6 से 10 सेकंड्स के लिए संकुचित करें और फिर शिथिल कर दें।
इस कसरत की 20 से 50 बार की आवृत्ति आवश्यक शक्ति प्रदान करती है। इसी प्रकार जकड़े हुए जोड़ को पूर्वावस्था में लाने और पहले की तरह वजन उठाने लायक सक्षम बनाने के लिए फिजियोथेरेपिस्ट कसरतें सुझाते हैैं। यह पूरी कार्रवाई मनोयोग से की जाए तो रोगी की रिकवरी बहुत तेज गति से हो सकती है। जोड़ प्रत्यारोपण के ऑपरेशन के बाद भी पहले जैसी ताकत हासिल करने में फीजियोथेरेपिस्ट कारगर भूमिका अदा कर सकता है।
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