- डॉ. रुमा शुक्ला
प्रसूति को लेकर इस युग में भी तरह-तरह की भ्रांतियाँ हैं। हमारी नानी, दादियाँ कहा करती थीं कि जचकी सही हो गई मतलब औरत का दूसरा जन्म हुआ, यह सही भी था, उस समय संसाधनों की कमी, आर्थिक विषमताओं एवं अशिक्षा के कारण मातृ एवं शिशु मृत्यु दर बहुत ज्यादा थी। परंतु 21वीं शताब्दी में भी हमारे देश में अज्ञानता के कारण स्थिति अच्छी नहीं है। सरकार अनेक योजनाएँ चला रही है, लेकिन जब तक समाज से भ्रांतियाँ दूर नहीं होतीं हमें पूरी सफलता नहीं मिल सकती।
सामान्य प्रसव तीन अवस्था में होता है।
गर्भावस्था के चालीस सप्ताह बाद-प्रथम अवस्था-दर्द के साथ बच्चेदानी का मुँह खुलना शुरू होता है साथ ही रक्तस्राव और पानी जाना शुरू होता है। इस समय डॉक्टरी जाँच जरूरी होती है, क्योंकि कई बार दर्द के साथ बच्चे के दिल की धड़कन में भी उतार-चढ़ाव होता है जिसे समय रहते पता लगाना आवश्यक है। अगर बच्चे की बढ़त (ग्रोथ) कम है तो दर्द के साथ बच्चा डिस्ट्रेस में चला जाता है। इसे एक सरल जाँच (सीटीजी) द्वारा मालूम किया जा सकता है। यदि पानी जाना शुरू हो गया है तो डॉक्टर को जरूर दिखाएँ। ऐसे समय माँ और बच्चे को इन्फेक्शन से बचाने के लिए एंटीबायोटिक दिए जाते हैं। इसमें देरी नहीं करना चाहिए। कई बार परिवार के लोग सोचते हैं कि जब तक दर्द शुरू नहीं हो- अस्पताल क्यों जाएँ? दाई को दिखा लेते हैं, जो कई जटिल परिस्थितियों में रात को केस को संभालने में सक्षम नहीं होती। जब जाँच की सुविधाएँ बंद हो जाती हैं तब डॉक्टर के पास आते हैं। अगर ऐसी सुविधा रात में उपलब्ध भी होती है तो इमरजेंसी चार्ज भी ज्यादा लगते हैं। अगर महिला को समय रहते दिखाया जाए तो अनावश्यक खर्च और कई परेशानियों से बचा जा सकता है। हमारे समाज में यह डर है या अविश्वास कि अस्पताल जाने से डॉक्टर ऑपरेशन कर देंगे। जबकि कोई भी डॉक्टर बिना कारण ऑपरेशन नहीं करेगा।
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