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अलग-अलग बुखारों के लिए जाँचें
टायफाइड : यह दूषित जल से होने वाला एक जीवाणु संक्रमण है। लंबी अवधि का बुखार होने पर टायफाइड की शंका होती है तथा इसकी जाँच के लिए ब्लड कल्चर, विडाल टेस्ट कराई जाती है। कई बार विडाल टेस्ट को रिपीट भी कराना होता है, किंतु टायफाइड के लिए ब्लड कल्चर कराना सर्वाधिक उपयुक्त जाँच है। लंबी अवधि के इस प्रकार के ज्वर के लिए सीने का एक एक्स-रे, पेट की सोनोग्राफी जाँच, पेशाब का सामान्य व कल्चर जाँच, मल की जाँच भी कई बार कराई जाती है।

गले का संक्रमण : गले में होने वाले संक्रमण जीवाणु, विषाणु या एलर्जीजनित हो सकते हैं, जो नाक के दोनों ओर उपस्थित साइनस,
इन सामान्य जाँचों के अतिरिक्त भी कई बार रोग की पहचान करने में कठिनाई होती है और कतिपय महँगी जाँच जैसे सीटी स्कैन, एमआरआई, सोनोग्राफी, आईजी स्टडी, सीएसएफ करानी पड़ती है
मुखद्वार, टॉन्सिल, फेरिंक्स या लेरिंक्स में उपस्थित हो सकते हैं। इन रोगों के उपचार के लिए चिकित्सक के द्वारा क्लिनिकल जाँच के अलावाकम्प्लीट ब्लड काउंट कराया जाता है जिसमें रक्त में उपस्थित आरबीसी, डब्ल्यूबीसी व प्लेटलेट्स की गणना की जाती है। इसके अतिरिक्त एक्स-रे, पैरानेसल साइनस, थ्रोट स्वॉब (रुई के फाहे में गले के स्राव की जाँच) भी कराई जाती है।


मूत्र नली का संक्रमण : इस हेतु मूत्र की सामान्य व कल्चर जाँच के साथ-साथ अल्ट्रासोनोग्राफी की पेट की जाँच आवश्यक है, जो किडनी, मूत्राशय की वस्तुस्थिति बताती है।

टीबी : खाँसी यदि 3 सप्ताह से अधिक रहे, शाम को बुखार, वजन में कमी, खाँसी में खून जैसे लक्षण आने लगें तो ऐसी अवस्था में चिकित्सक सीबीसी एवं एक्स-रे चेस्ट के साथ खाँसी में निकलने वाले बलगम (खँखार) की जाँच कराते हैं। खँखार की जाँच से टीबी के जीवाणु की उपस्थिति का पता चलता है और औषधियाँ प्रारंभ की जाती हैं, जो सभी शासकीय औषधालयों पर निःशुल्क उपलब्ध होती हैं।

एचआईवी/ एड्स : तेजी से पाँव पसारती यह बीमारी असुरक्षित यौन संबंध, संक्रमित सुई तथा बिना उपयुक्त जाँच के रक्तदान से होती है। इस रोग संक्रमण में भी रक्त की जाँच कराना आवश्यक है। एचआईवी की जाँच प्रत्येक लंबी अवधि बुखार, प्रसूति व शल्यक्रिया के पूर्व कराई जानी चाहिए।

इन सामान्य जाँचों के अतिरिक्त भी कई बार रोग की पहचान करने में कठिनाई होती है और कतिपय महँगी जाँच जैसे सीटी स्कैन, एमआरआई, सोनोग्राफी, आईजी स्टडी, सीएसएफ करानी पड़ती है ताकि शरीर में उपस्थित सेप्टिक फोकस, ट्यूबरकुलोमा, मेनिंजाइटिस, एनसेफेलाइटिस, पीआईडी जैसे घातक व जानलेवा रोगों की सही एवं शीघ्र पहचान की जा सके।
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