* शल्य चिकित्सा से मायोपिया के शत-प्रतिशत ठीक होने का आश्वासन न देने की सलाह।
* आवश्यक रूप से बताया जाए कि शल्य चिकित्सा के पश्चात भी चश्मा लगाना पड़ सकता है। | हायपरमेट्रोपिया : इस दोष में आँख की लंबाई सामान्य से कम होती है। फलस्वरूप प्रतिबिंब दृष्टिपटल के पीछे बनता है |
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* संदर्भित शल्य चिकित्सा केवल कांतिवर्धक (कॉस्मेटिक) है।
* चश्मे का नंबर स्थिर न हो जाए, शल्य चिकित्सा करना अनुचित है।
* शल्य चिकित्सा के बाद आँख का पर्दा अपने स्थान से खिसक सकता है (डिटेचमेंट ऑफ रेटिना)।
हायपरमेट्रोपिया : इस दोष में आँख की लंबाई सामान्य से कम होती है। फलस्वरूप प्रतिबिंब दृष्टिपटल के पीछे बनता है। जन्म के समय प्रत्येक शिशु की आँख हायपरमेट्रोपिक होती है। आयु के साथ आँख की लंबाई बढ़ती है और यह दोष समाप्त हो जाता है। इस दोष में पासका काम विशेषकर कृत्रिम प्रकाश में काम करने में कठिनाई अधिक होती है।
इसके लक्षण हैं-
* आँख में सूखापन * जलन, दर्द, भारीपन तथा सिरदर्द * पलकों का अधिक झपकना, तिरछापन भी हो सकता है।
उपचार : उपयुक्त चश्मे का उपयोग ही इसका उपचार है।
एस्टीगमेटीज्म (दृष्टिवैषम्य)- इस दोष में प्रकाश बिंदु दृष्टिपटल पर प्रतिबिंब को समोचित नहीं कर पाता है। कॉर्निया की गोलाई में त्रुटि या पारदर्शिता प्रभावित होने से यह दोष संभव है। इसके लक्षण हैं-
* दृष्टिदोष, अक्षरों का मिला-जुला दिखना * भारीपन, नेत्र गोलक (आई बॉल) में दर्द
उपचार : इस हेतु चश्मे का उपयोग आवश्यक है। इसमें विशेष प्रकार के लैंस (सिलेंड्रिकल) दिए जाते हैं। कुछ विशेष परिस्थितियों में कॉन्टेक्ट लैंस भी दिए जाते हैं।
प्रेसबायोपिया : यह दोष आयु आधारित है और सामान्य स्थिति में 40 वर्ष की आयु के पश्चात ही होता है। इसका एकमात्र कारण है- बढ़ती उम्र के कारण आँख के अंदर के लैंस का लोच कम होना। इस प्रकार के दोष में आरंभ में शाम के समय कम प्रकाश में पास की वस्तु या पढ़ने-लिखने में कठिनाई होती है।
उपचार : चश्मे द्वारा ही होता है जिसे प्रति दो वर्ष में बदलना पड़ता है। क्रम 60 वर्ष की आयु तक चलता है। चश्मे में उत्तक-कॉन्वेक्स लैंस दिए जाते हैं।
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