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मीठा जहर न खाएँ और न खिलाएँ
फल के सेवन में अँगूर, सेब, रसबेरी आदि हैं। एक प्लान्ट पैथालॉजिस्ट एक बार अँगूर का बगीचा देखने गया। किसान ने कहा कि यदि एक अँगूर के पत्ते में कोई बीमारी निकाल दो तो जो चाहो वो ईनाम दूँगा लेकिन बहुत निरीक्षण के बाद एक भी पत्ते में कोई भी बीमारी नहीं मिली। कारण !!!! वहाँ हर हफ्ते दवाई का छिड़काव होता था।

आजकल कई फलों को कार्बाइड से पकाया जाता है, जैसे केला, म, पपीता आदि है। इस तरह से पकाए हुए फलों में पीले एवं हरे धब्बे होते हैं। यह पूरी तरह पीला नहीं होता है। केवल लंगड़ा आम को नहीं पकाते हैं। इसे पकाने से इसका हरापन काले रंग में बदल जाता है।

पकाने की पुरानी विधियाँ जैसे केले को धुँआ करके पकाना। आम, पपीता को ‘पान' में रखकर पकाना ही अच्छा और सुरक्षित है। इससे यह विषरहित होता है।

किराना दलहनों में जैसे मूँग, उड़द, चना, तुवर, मसूर को जहरीली दवाओं से उपचार कर सुंदर, आकर्षक बनाया जाता है। इनमें 1-2 साल ‍तक कीड़े नहीं लगते। वैसे ही आटा, मैदा, बेसन, सूजी, रवे में भी हल्का उपचार किया जाता है

विजय लक्ष्मी पंडित (1988) ने एक शोध पत्र में बताया कि हर मनुष्‍य प्रति वर्ष करीबन एक किलो जहर खाता है। अनुसंधानों के अनुसार प्रत्‍येक सब्जी व दालों का उपयोग करने से पहले इसे अच्छी तरह धोएँ। फिर 5 प्रतिशत खाने के सोडे का घोल बनाकर या 5 प्रतिशत सिरके का घोल पानी में बनाकर (1 लीटर पानी में 50 ग्राम सोडा) उसे भिगो दें।

इससे उपचारित कीटनाशक दवा घुल जाती है। 15 मिनट बाद निकालकर साफ पानी में धोकर उपयोग में लें।

1984 में हुआ भोपाल गैस त्रासदी कांड इसका ज्वलंत उदाहरण है। यूनियन कार्बाइड कीटनाशक दवा बनाती थी। उस त्रासदी में कई लोग मौत के घाट उतर गए और कुछ लोगों को टेट्राजेनिक, मुटाजेनिक व कारसिजेनिक प्रभाव झेलना पड़ा।

मध्यप्रदेश के खंडवा, खरगौन क्षेत्रों में और महाराष्‍ट्र आँध्रप्रदेश में कपास प्रमुख रूप से उगाई जाती है। अठवाल व घालीवाल के अनुसार लगातार जहरीली दवाओं के अंधाधुँध छिड़काव से लीवर व कैंसर जैसी भयानक बीमारी होने की पूरी संभावना होती है।

सभी प्रगतिशील देशों में बहुत पहले डीडीटी व बीएचसी दवाओं पर प्रतिबंध लग गया है, परंतु हमारे देश में आज भी ये खुलेआम बाजारों में बिक रही हैं

अब एक महत्‍वपूर्ण सुझाव। जैविक कीट नियंत्रक औषधि जैसे गोमूत्र, नीम का सत, मट्‍ठे का प्रयोग, तंबाखू का घोल, नीम, करंज की खली व इसका तेल बहुतायत से उपयोग हो रहा है।

किसान भाई सही सलाह के लिए कृषि-वैज्ञानिक, उपसंचालक कृषि आदि से संपर्क करें। सही व सुरक्षित कीटनाशक दवा का ही छिड़काव करें। बीजोपचार, समय से बुआई, खेतों की मेढ़ों की भी सफाई भी अवश्‍य करें। इन्‍हीं स्‍थानों में कीट पनपते हैं। इस बातों का ख्‍याल रखने स्‍वस्‍थ व सुंदर जीवन को बचाया जा सकता है।
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