- डॉ. के.एन. कपूर - डॉ. जयकरण सिंह (सं. नि. कीटशास्त्री व गेहूँ विशेषज्ञ)
इस देश में 1963 में गेहूँ उत्पादन में हरित क्रांति आई। इसके साथ ही उन्नत विभिन्न फसलों की खेती करना, विशेषकर शंकर जातियों का चलन, रासायनिक खादों का प्रयोग, मिश्रित खेती, अंतरवर्षीय फसलों की खेती (Relay Farming) का शुभारंभ हुआ। इससे एग्रोसिस्टम (Agrosystem) में कई समस्याएँ खड़ी हो गईं। विशेषकर कीट व बीमारियाँ प्रमुख रूप से सामने आईं।
इसकी रोकथाम के लिए नवीनतम कीटनाशक दवाओं का अंधाधुँध प्रयोग हो रहा है। इसमें 4 बातें विशेष रूप से प्रभावित हुईं -
- कीटों में प्रतिरोधक शक्ति का क्रमिक विकास, उन्हें भी इस दुनिया में जीना है। - प्रकृति में हानिकारक कीटों व उपयोगी कीटों (मित्र) का संतुलन बिगड़ना। - मछलियों, मधुमक्खियों का मरना एवं परभक्षी कीटों की कमी होना। - नित नए-नए कीट और बीमारियों का प्रादुर्भाव होना। - कीटनाशक दवाओं का असर (प्रभाव) खाद्य पदार्थों के संरक्षण में व पशु चारों में, मिट्टी व पानी में आ गया है।
श्री चट्टोपाध्याय (1980) ने अपनी पुस्तक में एवं श्री चँद्रशेखर (1997) के अनुसार इन दवाओं के लगातार प्रयोग से निम्नलिखित बीमारियों का सामना करना पड़ रहा है।
- सिर में चक्कर आना - डिजिनेस (Dizziness) जैसे एलर्जी, अस्थमा, एग्जिमा - शरीर में कफ का होना - फेफड़े व त्वचा की कई बीमारियाँ - Carcigenic growth याने कैंसर
(आर्टिकेरिया) हृदय संबंधी विकार, तीन धमनियों में, रक्तसंचार में (ब्लॉकेज) क्रमश: रुकावट, कोलेस्ट्रॉल का बढ़ना, आँखों में जलन और दृष्टि दोष इत्यादि हैं।
आजकल धन की अँधी दौड़ में प्राय: कई लोग लगे हैं। अत: किसान भाई भी पीछे क्यों रहें ! सब्जियाँ पैदा करने में विशेषकर वे बेमौसम सब्जियों जैसे फूल व पत्ता गोभी इत्यादि में सस्ती व जहरीली दवाओं का छिड़काव करते हैं और तुरंत दूसरे दिन सब्जी मंडी में उसे बेचने ले जाते हैं। एक साधारण-सा प्रयोग सभी अपने घरों में कर सकते हैं। दो बड़े वाले नाद-गमलों में पौधे रोपें। एक गमले में किसी भी दवा का प्रयोग न करें और दूसरे गमले में कीटनाशक दवाओं का छिड़काव करें। आप देखेंगे कि कीटनाशक दवा वाले गमले के पौधे में कीड़ों का झुंड इकट्ठा हो जाता है, और फूलगोभी उग ही नहीं सकती।
बेमौसम सब्जी खाकर आप न केवल स्वाद बिगाड़ रहे हैं, बल्कि आप बीमारियों को भी आमंत्रण दे रहे हैं।
कृषि वैज्ञानिकों को भी मेरी यही नेक सलाह है कि वे बेमौसम सब्जियाँ न उगाएँ। किसानों को चाहिए कि वे केवल ऑर्गेनिक दवाइयों जैसे मेलाथियान का ही प्रयोग करें और 10 दिन बाद उसकी तुड़ाई करें। मेलाथियान एक सुरक्षित दवा है।
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