- डॉ. ओपी लेखरा
आजकल लकवा के विषय में जागरूकता बढ़ी है इसका प्रमाण है लकवा में मरीज जल्द ही ऐसे अस्पताल संस्थान में पहुँचने लगे हैं। जहाँ सारी सुविधाएँ उपलब्ध हैं। पक्षाघात के सही निदान के लिए सीटी स्कैन, एमआरआई जरूरी तो है ही, गहन चिकित्सा कक्ष व पूर्ण न्यूरोलॉजी टीम की आवश्यकता उतनी ही महत्वपूर्ण है।
पक्षाघात (लकवा) बढ़ती उम्र की एक आम और गंभीर मेडिकल समस्या है। आज अपने देश में बेहतर सुविधाओं और जागरूकता के कारण औसतन आयु बढ़ी है। इस कारण भी लकवा के बचाव और इलाज पर चिंतन बढ़ गया है। हृदयाघात और कैंसर के बाद इसे मृत्यु का मुख्य कारण माना जाता रहा है। वैसे भी किसी अस्पताल व गहन चिकित्सा कक्ष में प्रवेश का लकवा मुख्य कारण रहता ही है।
मिथ्याओं के कारण कुछ वर्षों पूर्व तक लकवा के मरीज को लाइलाज मानकर उसे अपने हाल पर छोड़ दिया जाता था। जो उसके साथ अन्याय था। पर न्यूरोलॉजी में पिछले कुछ दशक में आमूल परिवर्तन आए हैं जिससे यह धारणा गलत साबित हुई है। वैसे भी आजकल पक्षाघात को ब्रैन-अटैक की संज्ञा देकर इस बात पर जोर दिया जा रहा है कि जो हार्ट-अटैक के लिए सही है वही पक्षाघात के लिए भी जरूरी है। दिलो-दिमाग का संबंध वैसे भी सर्वविदित है। दिल की चोट अक्सर दिमाग पर असर डालती है। पक्षाघात के इलाज में भी उतनी ही तत्परता रहनी चाहिए क्योंकि दिमाग और उसकी कोशिकाओं का पुनर्निर्माण नहीं होता है। इस कारण शुरू के 3-6 घंटों में हुआ सही इलाज आगे के सुधार के लिए बहुत अहमियत रखता है।
आजकल लकवा के विषय में जागरूकता बढ़ी है इसका प्रमाण है लकवा में मरीज जल्द ही ऐसे अस्पताल संस्थान में पहुँचने लगे हैं जहाँ सारी सुविधाएँ उपलब्ध हैं। पक्षाघात के सही निदान के लिए सीटी स्केन, एमआरआई जरूरी तो है ही, गहन चिकित्सा कक्ष व पूर्ण न्यूरोलॉजी टीम कीआवश्यकता उतनी ही महत्वपूर्ण है। आजकल खून का थक्का गलाने की दवा उपलब्ध होने की वजह से मरीजों को शुरुआती चंद घंटों में पहुँचाना नितांत आवश्यक माना जाता है। वैसे तो पक्षाघात को पचास वर्ष के बाद की समस्या माना जाता रहा है, किंतु आधुनिक शहरी जीवन के दबाव और तनाव के कारण मस्तिष्काघात और मस्तिष्क रक्तस्राव की घटना में वृद्धि हो रही है। उच्च रक्तचाप, मधुमेह, मोटापा पक्षाघात के आम कारण हैं किंतु आधुनिक समय में अति व्यस्तता, दिमागी तनाव, धूम्रपान, शराब आदि के सेवन की प्रवृत्ति बढ़ने के कारण कम उम्र में भी कामकाजी लोग पहले की तुलना में अधिक संख्या में पक्षाघात से ग्रसित हो रहे हैं।
लकवा के शुरुआती लक्षणों को कैसे पहचानें? करीब आधे मरीजों में पक्षाघात के पहले कुछ लक्षण मरीज को आभास दिलाते हैं जो खतरे की | संक्षेप में पक्षाघात से बचने के लिए चालीस वर्ष के बाद रक्तचाप, मधुमेह, कॉलेस्ट्रोल का नियमति चेक-अप कराएँ। धूम्रपान, अल्कोहल और दिमागी तनाव से बचें |
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घंटी के समान होते हैं। इन्हें पहचान कर पक्षाघात को टाला जा सकता है। शरीर के किसी एक आधे हिस्से में अचानक झुनझुनी, हल्कापन महसूस होना या ताकत में कमी आना, बोली में दिक्कत आना, बार-बार चक्कर आना, अचानक ऐसा सिरदर्द होना जिसे आपने कभी जिंदगी में महसूस न किया हो। ये सारे लक्षण आने वाली दिक्कतों का आभास दिलाते हैं। ऐसी अवस्था में तुरंत न्यूरोलॉजी सलाह लेनी चाहिए।
अधिकाधिक संख्या में पुराने लकवा के मरीजों का चेक-अप के लिए आना यह साबित करता है कि जागरूकता बढ़ी है। ऐसे मरीजों को पुनर्वास संबंधी जानकारी लाभप्रद होती है। पक्षाघात के मरीजों के इलाज में पुनर्वास उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि इलाज। विकसित देशोंमें पक्षाघात के मरीजों के लिए पुनर्वास केंद्र होने से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता है। परंतु अपने परिवेश और सामाजिक व्यवस्था में यह मुश्किल-सा जान पड़ता है। ढलती उम्र में ऐसा आघात होना दूसरों पर अचानक निर्भरता महसूस करना बहुत बड़ा मानसिक सदमा होता है। इस कारणदेखा गया है कि शुरू की गहन चिकित्सा से निकलने पर बाद की अवस्था में मरीज अवसाद में भी चले जाते हैं। इस कारण पुनर्वास पर अधिक जोर दिया जाता है।
संक्षेप में पक्षाघात से बचने के लिए चालीस वर्ष के बाद रक्तचाप, मधुमेह, कॉलेस्ट्रोल का नियमति चेक-अप कराएँ। धूम्रपान, अल्कोहल और दिमागी तनाव से बचें। इससे कम-से-कम दिमाग और हृदय के रोगों को पहचानने व टालने का प्रयास किया जा सकेगा।
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