आधुनिक चिकित्सा विज्ञान भी इसे स्वीकार कर चुका है कि हमारा शरीर हर साँस के साथ दस हजार पार्टिकल गिराता है। हमारे शरीर से लगातार मृत त्वचा झड़ती रहती है। घरों में मिलने वाली धूल और कुछ नहीं बल्कि हमारी मृत त्वचा है। इस मृत त्वचा पर जो जीव पलते हैं उन्हें डस्ट माइट्स कहते हैं। यह कई बीमारियों की जड़ है। इससे खाज, खुजली, एलर्जिक सर्दी हो सकती है तथा अस्थमा के तीव्र दौरे तक पड़ सकते हैं।
1694 में जब माइक्रोस्कोप के आविष्कारक एंटॉन वॉन लियुवेनहॉक ने जब यह घोषणा की कि किलनी (माइट्स) धूल पर जिंदा रहती हैं तो किसी ने उस पर भरोसा नहीं किया। अब 300 से ज्यादा सालों बाद सारी दुनिया में यह एक स्थापित सत्य है कि माइट्स घरों में पाई जानेवाली धूल पर पलती है। अपने छोटे आकार के कारण इन्हें बिना माइक्रोस्कोप के नहीं देखा जा सकता लेकिन ये हमेशा हर घर में मौजूद रहती हैं। किसी भी घर को कभी भी धूल से मुक्त नहीं किया जा सकता, क्योंकि जिसे हम धूल समझते हैं वह हमारी मृत त्वचा है जो निरंतर शरीर से झड़ती रहती है। इसी पर पलती है माइट्स। आमतौर पर इसका आवास बिस्तर, तकिए, मोटी चादरें, दरियाँ और ऊनी कपड़े होते हैं। इसे आपकी सबसे प्यारी आरामकुर्सी पर या सोफे के उस स्थान पर पाया जा सकता है जहाँ आप सबसे अधिक समय बिताते हैं।
नर कीलनी की आयु 20 से 30 दिन होती है जबकि गर्भवती कीलनी 10 हफ्ते तक जीती है। जिंदगी के आखिरी पाँच हफ्तों में यह 60 से 100 अंडे देती है। कीलनी को आप तेज डिटरजेंट साबुन से या ब्लीच से नहीं मार सकते। यह केवल 60 डिग्री सेल्सियस (140 डिग्री फैरनहीट) केतापमान पर मरती है। तेज धूप में एक घंटे तक कपड़ा रखने पर कीलनी जीवित नहीं रह पाती। यह बहुत तेजी से अपनी आबादी बढ़ाती है। यूँ तो कीलनी किसी भी वातावरण में रह लेती है लेकिन नम वातावरण इसके लिए बहुत मुफीद होता है।
सिर्फ तकिए में ही कीलनी शुष्क मौसम में भी पनप सकती है, क्योंकि उसे इंसानी शरीर द्वारा घंटों तक सांस लेने और छोड़ने के कारण पर्याप्त नमी मिल जाती है। औसतन एक व्यक्ति हर दिन 1.5 ग्राम मृत त्वचा के सेल्स त्याग देता है। यह लगभग 0.3 से 0.45 किलोग्राम प्रतिवर्ष हो सकता है। आदर्श स्थिति में मृत त्वचा का इतना हिस्सा लगभग एक लाख कीलनियों के लिए पर्याप्त होगा।
अस्थमा और एलर्जी
कीलनी का अधखाई हुई त्वचा और मल से एलर्जी होती है। इससे एलर्जिक अस्थमा, रायनाइटिस, कंजक्टिवाइटिस, डर्मिटाइटिस जैसे रोग होते हैं। कीलनी का शरीर भी एलर्जिक होता है तथा इसके लगातार संपर्क से एक्जिमा होता है। जिन लोगों को बहुत जल्दी और बार-बार एलर्जीहोती है, उन्हें ये उपाय करना चाहिए-
* तकियों और गद्दों को हमेशा कवर चढ़ाकर रखें।
* तकियों को दो हफ्तों में तथा गद्दों को हर तीसरे या चौथे महीने धुलवाया जा सकता है। यदि धुलवा न सकें तो धूप में सारे दिन के लिए रखा जा सकता है।
* हर दूसरे दिन तकिए के गिलाफ बेड शीट्स धुलाएँ।
* खिड़कियों और दरवाजों के पर्दों को नियमित रूप से धुलाएँ।
* अपने बच्चों के लिए ऐसे स्टफ्ड टॉयज खरीदें जिन्हें धुलवाया जा सके।
* बेडरूम में कालीन रखने से परहेज करें। खासतौर पर ऐसे लोग तो कतई न रखें जिन्हें एलर्जिक सर्दी होती है।
* घर में ऐसा फर्नीचर रखें जो या तो लकड़ी का हो या फिर मोल्डेड प्लास्टिक का हो।
* वैक्यूम क्लीनर से घर साफ रखें लेकिन उसका डस्टबैग भी तत्काल फेंकना याद रखें।
जिन घरों में सूरज की रोशनी नहीं आती वहाँ कीलनी अपना निवास बना लेती है। घर में ऐसी व्यवस्था करें कि रोशनी खिड़कियों और दरवाजों से आती रहे। बंद कमरों में सूरज की एक किरण में उड़ती हुई जो धूल दिखाई देती है वह कुछ और नहीं बल्कि कीलनी है। याद रहेकीलनी केवल मृत त्वचा पर पलती है। इसलिए घर को जितना संभव हो 'धूल' से मुक्त रखें। एलर्जी से भी बचेंगे और स्वस्थ रहेंगे।
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