-वी.एस. बड़जात्या
कुत्तों या अन्य पशुओं जैसे भेड़िया मन्गुस, लोमड़ी, सियार, गीदड़ चमगादड़, भेड़, गाय, बन्दर, घोड़ा, बिल्ली के काटने से होने वाला रोग है रेबीज। यह रोग मनुष्य जाति को हजारों वर्षों से ज्ञात है और यह अब भी विकासशील देशों में एक समस्या बना हुआ है। पशुओं के काटने से होने वाली इस बीमारी से, अकेले भारत में ही प्रतिवर्ष पैंतीस हजार जानें जाती हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन की तालिका में रेबीज से होने वाली मौतें बारहवें क्रम पर हैं। विश्व में जानवरों के काटने के चालीस लाख मामले प्रतिवर्ष होते हैं। इलाज की अज्ञानता अथवा उपचार के अभाव में साठ हजार मौतें विश्व में प्रतिवर्ष होती हैं। सर्वाधिक मौतें एशिया में होती हैं।
उपरोक्त पशुओं के काटने के पाँच लाख मामले प्रतिवर्ष दर्ज कराए जाते हैं, जिनमें चार लाख पच्चीस हजार मामले कुत्तों के काटने के होते है।
पशुओं के काटने पर पीड़ित व्यक्ति के संबंधियों को मालूम पड़ते ही काटे गए स्थान को पानी व साबुन से अच्छी तरह धो देना चाहिए। धोने के बाद काटे गए स्थान पर अच्छी तरह से टिंचर या पोवोडीन आयोडिन लगाना चाहिए। ऐसा करने से कुत्ते या अन्य पशुओं की लार में पाए जाने वाले कीटाणु सिरोटाइपवन लायसावायरस की ग्यालकोप्रोटिन की परतें घुल जाती हैं। इससे रोग की मार एक बड़े हद तक कम हो जाती है, जो रोगी के बचाव में सहायक होती है। इसके तुरंत बाद रोगी को टिटेनस का इन्जेक्शन लगवाकर चिकित्सालय में ले जाना चाहिए। यहाँ चिकित्सक की सलाह से काटे गए स्थान पर कार्बोलिक एसिड लगाया जाता है, जिससे अधिकतम कीटाणु नष्ट हो जाते हैं। इसके बाद चिकित्सक की सलाह पर आवश्यकतानुसार इंजेक्शन लगाए जाते हैं, जो तीन या दस दिन की अवधि के होते हैं। तत्पश्चात आवश्यकतानुसार निश्चित दिनों पर बुस्टर डोज भी दिए जाने का प्रावधान है, जो चिकित्सक के विवेक व काटे गए पशु की जीवित या मृत होने की अवस्था पर निर्भर करते हैं। इंजेक्शन लगाने की क्रमबद्धता में लापरवाही घातक सिद्ध हो सकती है। इस रोग का प्रकोप पशु के काटने के तीन दिन के बाद व तीन वर्ष के भीतर कभी भी हो सकता है।
कुत्तों के काटने से होने वाले रोग को हाइड्रोफोबिया या जल संत्रास अलर्क विष भी कहते हैं। इससे रोगी को जल के देखने से, छूने से, हवा के झोंको से, तीव्र प्रकाश से तथा आवाज से भी तकलीफ होने लगती है।
लक्षण : काटने से तीन दिन से तीन साल के भीतर रोग के लक्षण प्रकट होते हैं। साधारण अवधि चालीस दिन की है। इस रोग में निम्न तीन अवस्थाएँ देखी जा सकती है-
आक्रमण की अवस्था : काटने के स्थान पर रक्तिमा, जलन, पी़ड़ा आदि। मन्द ज्वर, नाड़ी की तीव्रता, शिरशूल, बेचैनी, चिड़चिड़ापन, भय, निगलने में कठिनाई, प्रकाश व आवाज का सहन न होना, निद्रानाश आदि।
उत्तेजना की अवस्था : थो़ड़ी सी उत्तेजना मिलने पर पेशियों में जकड़न हो जाती है। रोगी जल से डरने लगता है। पहले ये दौरे अल्पकालिक होते हैं। बाद में 15-20 मिनट तक रहते हैं।
घात की अवस्था : चार-पाँच दिन बाद दौरे बंद हो जाते हैं। पेशियों का घात हो जाता है। रोगी बेहोश होकर एक-दो दिन में ह्दय का कार्य बंद होने से मर जाता है। सम्पूर्ण रुग्ण अवस्था दस दिनों से अधिक नहीं रहती है।
पागल श्वान की पहचान : अकारण भौंकना, इधर-उधर दौड़ना, आक्रमण करना, घास, पत्थर, वस्त्र आदि अखाद्य पदार्थों को खाना, मुख से बराबर लार गिरना आदि प्रमुख लक्षण हैं। ऐसे पशु की मृत्यु प्रायः दस दिनों में हो जाती है।
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