विश्व में होने वाली मौतों में दूसरा सबसे बड़ा कारण तंबाकू है। वर्तमान में विश्व में प्रतिवर्ष 50 लाख लोग मरते हैं जिनमें से हर दस वयस्क में से एक की मौत तंबाकू के कारण होती है। यदि धूम्रपान की यह हालत लगातार रही तो वर्ष 2020 तक प्रतिवर्ष 10 लाख लोग इसके कारण मारे जाएँगे। विश्व में धूम्रपान करने वाले आधे लोग, जिनकी संख्या लगभग 65 करोड़ है, धूम्रपान की वजह से मौत के आगोश में समा जाएँगे।
तंबाकू विश्वस्तर पर होने वाली बीमारियों की चौथी सबसे बड़ी वजह है। तंबाकू का उपयोग अर्थव्यवस्था के लिए भी हानिकारक है। इसके अतिरिक्त तंबाकू से होने वाली बीमारियों का इलाज भी बहुत महँगा होता है जिसे आम आदमी वहन नहीं कर सकता जैसे- मुँह और फेफड़ों का कैंसर। तंबाकू आदमी की कार्यक्षमता को भी प्रभावित करती है, तंबाकू का उपयोग और धूम्रपान करने वाले लोग कमजोरी के कारण अपनी पूर्ण क्षमता का उपयोग नहीं कर पाते। एक रिपोर्ट के अनुसार तंबाकू के हानिकारक परिणामों से विश्वभर में प्रतिवर्ष लगभग 200 हजार मिलियन यूएस डॉलर का नुकसान होता है जिसमें से एक तिहाई विकसित देशों को होता है।
तंबाकू और गरीबी एक दूसरे से जुड़े माने जाते हैं। बहुत से अध्ययन में यह तथ्य सामने आए हैं कि प्रति व्यक्ति कम आय वाले बहुत से देशों में कई गरीब परिवार में कुल घर खर्च का लगभग 10 प्रश तंबाकू या धूम्रपान पर खर्च होता है। जो सीधे तौर पर उनकी अन्य आवश्यकताओं जैसे भोजन, शिक्षा और स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। इसके अतिरिक्त यह उनके स्वास्थ्य संबंधी बजट को भी बढ़ाता है और उन्हें अकाल मृत्यु की ओर धकेलता है। यदि तंबाकू और धूम्रपान में खर्च होने वाली राशि को शिक्षा पर खर्च किया जाए तो साक्षरता दर बढ़ सकती है और लोगों को धूम्रपान से होने वाली बीमारियों के प्रति सचेत किया जा सकता है।
अनुभव दर्शाता है कि तंबाकू और धूम्रपान रोकने के लिए काफी प्रयास किए जा चुके हैं और लगातार जारी हैं। इनमें से जो सबसे प्रभावी उपाय है कि जनसंख्या को देखते हुए नीतियाँ तैयार की जाएँ जैसे कि प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष धूम्रपान निषेध किया जाए, तंबाकू पर कर लगाया जाए और कीमत बढ़ा दी जाए, सार्वजनिक और कार्यस्थल पर धूम्रपान निषेध क्षेत्र घोषित किए जाएँ और तंबाकू उत्पादों की पैकिंग पर स्वास्थ्य संबंधी मैसेज दिए जाएँ। ये सारे उपाय विश्व स्वास्थ्य संगठन की तंबाकू नियंत्रण नीति के अंतर्गत मान्य किए गए हैं।
सिगरेट सीक्रेट
धूम्रपान पर किए गए एक अध्ययन के अनुसार माता-पिता यदि अपने बच्चों को धूम्रपान की आदत से बचाना चाहते हों तो उन्हें बच्चों के आठ-नौ वर्ष के होने पर धूम्रपान छोड़ देना चाहिए। उन बच्चों की धूम्रपान करने की आशंका 40 प्रतिशत कम हो जाती है जिनके माता-पिता इनकी उम्र आठ वर्ष होने पर इसे छोड़ देते हैं जबकि बच्चों की उम्र 17-18 वर्ष होने तक जो माता-पिता धूम्रपान जारी रखते हैं उनके बच्चों को भी इसकी आदत लगने की आशंका 40 प्रतिशत बढ़ जाती है।
सिगरेट का इतिहास
सिगरेट बनाने की मशीन का विकास 1750 से 1800 ईस्वी के बीच हुआ। सिगरेट बनाने की पहली मशीन एक मिनट में लगभग 200 सिगरेट बनाती है जबकि वर्तमान की मशीन एक मिनट में 9000 सिगरेट बना देती है। कम उत्पादन लागत और सिगरेट के उपयोग के विज्ञापनों ने तंबाकू कंपनियों के लिए इस दौरान मार्केट को मजबूत किया। धूम्रपान से होने वाली बीमारियों को देखते हुए किसी भी तंबाकू कंपनी के खिलाफ पहला केस बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में लगाया गया था।
2003 का कानून 1 मई 2004 से प्रभावी
2003 में भारत सरकार ने एक अधिनियम पारित किया था, जिसके तहत ये कहा था-
* कोई भी व्यक्ति सार्वजनिक स्थानों पर धुम्रपान नहीं करेगा। इनमें सभागृह, भवनों, रेलवे स्टेशन, पुस्तकालय, अस्पताल, रेस्तराँ, कोर्ट, स्कूल, कॉलेज आदि आते हैं।
* सार्वजनिक स्थलों पर भारतीय भाषाओं में ब़ड़े अक्षरों में गैर-धूम्रपान क्षेत्र के बोर्ड लगाए जाएँ।
* सिगरेट और तंबाकू उत्पादों का विज्ञापन नहीं किया जाएगा।
* तीस कमरों के होटल या तीस से अधिक लोगों के बैठने की रेस्तराँ में मालिक या मैनेजर ये तय करें कि धूम्रपान व गैर-धूम्रपान क्षेत्र अलग हों। लोगों को गैर-धूम्रपान क्षेत्र में जाने के लिए धूम्रपान वाले इलाके से न गुजरना पड़े।
* तंबाकू एवं अन्य तंबाकू उत्पाद- गुटखा, खैनी, जर्दा, तंबाकू वाले मसाले, बीड़ी, सिगरेट, हुक्का, चुरट, सिगार, नसवार 18 साल से कम के लोगों के लिए प्रतिबंधित है।
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