-डॉ. विजय चौरड़िया
छोटे बच्चों में नकसीर, अक्सर नाक में अँगुली डालने की आदत, नाक के संक्रमण, एडीनॉइड, टॉन्सिल्स एवं कभी-कभार पेट में कीड़ों की वजह से होती है। गर्मी के मौसम में अनेक व्यक्तियों या बच्चों में, बिना कारण अचानक नाक से नखलोई चलने लगती है। ऐसा अधिक ताप की वजह से नाक की महीन खून की नलिकाओं के खुलने से होता है।
नाक के सामान्य ढंग से कार्य करने हेतु अनुकूलतम तापमान एवं आर्द्रता क्रमशः 33-34 डिग्री एवं 45 प्र.श. होते हैं। बार-बार या अचानक तापमान एवं आर्द्रता में परिवर्तन से नाक की सामान्य कार्यप्रणाली प्रभावित होती है एवं व्यक्ति नाक बहने या नाक में घुटन महसूस होने जैसी शिकायत कर सकता है। अधिक गर्मी या अधिक ठंड दोनों दशाओं में नाक के अंदर के अस्तर पर मौजूद म्यूकोसिलियरी प्रवाह कम हो जाता है। एयरकंडीशनर नाक के बेहतर कार्य हेतु उपयुक्त होता है। परंतु ऐसे माहौल से गर्म वातावरण में धीरे से निकलना चाहिए। पंखे के ठीक नीचे या कूलर के ठीक सामने नहीं सोना चाहिए।
सामान्य सर्दी या कोराईझा या श्वसन तंत्र के अन्य विषाणु संक्रमण के दौरान आराम करें, मुँह-गले की स्वच्छता रखें, औषधियुक्त भाप लें, अधिक मात्रा में तरल पदार्थ जैसे गर्म चाय, कॉफी (उकाली) का सेवन करें। सर्दी रोकने की गोलियाँ ले सकते हैं, परंतु एंटीबायोटिक्स जीवाणु संक्रमण होने की दशा में डॉक्टरी सलाह से लें। नाक में बूँद की दवा सामान्यतः जरूरी नहीं होती है। सर्दी या अन्य श्वसन तंत्र के संक्रमण के दौरान भीड़ भरी जगह जैसे ट्रेन, बस तथा अधिक धूल वाली जगह पर न जाएँ। आँखों एवं नाक में अँगुली नहीं डालें। नाक साफ करने के बाद हाथ साबुन-पानी से धोएँ। दूसरे व्यक्ति के चेहरे के नजदीक खाँसे-छींके नहीं। जोर से नाक साफ नहीं करें क्योंकि संक्रमण सायनस या यूस्टेशियन नली द्वारा बीच के कान में जा सकता है। नाक में यदि बूँद की दवा डाल रहे हैं तो आपका ड्रॉपर एवं रूमाल दूसरे व्यक्ति द्वारा प्रयोग में नहीं लाया जाना चाहिए। तेज सर्दी से ग्रसित होने पर हवाई यात्रा न करें परंतु आवश्यक होने पर यात्रा से 1 घंटे पूर्व सर्दी की गोली एवं ठीक यात्रा शुरू होने तथा हवाई जहाज से उतरते वक्त नाक में बूँद की दवा डालें।
नाक में अँगुली डालने की आदत अस्वच्छता की परिधि में आती है। नाक में सूखी पपड़ी जमती या सूखापन लगता है तो घी की 2-3 बूँदें डाल सकते हैैं, सुबह नहाते वक्त नियमित रूप से नाक के अंदर पानी डालकर नाक को धोना चाहिए ताकि पपड़ी या जमी गंदगी रोज साफ होती रहे। सायनस की बीमारी अक्सर नाक की टेढ़ी हड्डी या टर्बीनेट्स असंगतियों की वजह से होती है। जिसका उपचार उपयुक्त शल्य क्रिया द्वारा ही ठीक से संभव होता है। छींकना, श्वसन तंत्र की सुरक्षा प्रक्रिया का हिस्सा है। परंतु लंबे समय तक अधिक संख्या में छींके आना अक्सर एलर्जी की वजह से होता है। नाक की टेढ़ी हड्डी सायनस एवं नाक के संक्रमणों की वजह से भी छींके आती हैं।
नाक की एलर्जी के सामान्य एलर्जन्स हैं- वृक्षों, घास, घासपात के परागकण, घर के अंदर मौजूद धूल, कॉकरोच आदि। खाद्य पदार्थों के द्वारा नाक में एलर्जी सामान्यतः बहुत कम होती है, परंतु दूध, चॉकलेट, मछली, अनाज, दालें, अंडा, मूँगफली में एलर्जन्स होते हैं।
धूम्रपान एवं अन्य वायुमंडलीय प्रदूषक तत्व नाक के अस्तर पर उत्तेजक या प्रकोपक की तरह असर दिखाकर, हल्की सूजन पैदा करते हैं, जिससे नाक से स्राव हो सकता है या गंदगी जम सकती है। एलर्जी से ग्रसित व्यक्ति में ये कारण ज्यादा परेशानी पैदा करते हैं। ऐसा माना जाता है कि बढ़ते प्रदूषण के कारण नाक की एलर्जी के मरीजों की संख्या बढ़ती जा रही है। अच्छी शल्यक्रिया की उपलब्धता से आज सायनस का इलाज प्रभावी रूप से होता है। आधुनिक इलाज एवं शल्यक्रिया सिद्धांतों के कारण आज एन्ट्रल पंक्चर नहीं किए जाते हैं। लंबे समय तक नाक में बूँद की दवा डालने से नाक के अस्तर को नुकसान पहुँचता है एवं राइनाइटिस मेडीकामेन्टोसा नामक व्याधि हो सकती है, जिसका इलाज आसान नहीं होता है।
खर्राटे भरने को महज एक आदत या सामान्य बात समझकर नहीं छोड़ देना चाहिए। उपयुक्त चिकित्सकीय परामर्श एवं जाँच-पड़ताल द्वारा इसका ठीक से कारण पता लगाकर संभव इलाज या शल्यक्रिया करवाना चाहिए। नियंत्रण या रोकथाम के उपाय भी अपनाना चाहिए। लंबी अवधि से खर्राटे की समस्या से ग्रसित मरीजों में हृदय रोग, उच्च रक्तचाप एवं दिमागी रक्त संचलन से असंगति से स्ट्रोफ या पक्षाघात जैसी बीमारी होने का प्रतिशत ज्यादा होता है।
टॉन्सिल्स वैसे तो शरीर के सुरक्षा तंत्र के भाग होते हैं परंतु जीवाणुओं द्वारा टॉन्सिल्स के लंबे समय तक या बार-बार ग्रसित होने की स्थिति में ये बार-बार तकलीफ देते रहते हैं और तब इनकी शल्यक्रिया जरूरी होती है। गले में लगातार खराश, अचानक या लंबे समय से आवाज बैठ जाती है या खाँसी रहती है या गले में दर्द बना रहता है तो तुरंत विशेषज्ञ को दिखाएँ।
छोटे बच्चों की श्वास नली में मूँगफली, सुपारी आदि न जाए इस हेतु उन्हें ये चीजें न दें। उनके आसपास छोटी-छोटी वस्तुएँ न रखें जिन्हें वे मुँह में ले सकें।
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