यह एक अनैतिक तकनीक थी, जिसमें भ्रूण को मारा जाता था या मरे हुए भ्रूण का उपयोग किया जाता था। पर अब वैज्ञानिकों ने इसका भी विकल्प खोज लिया है। उन्होंने एक ऐसे स्रोत की खोज कर ली है, जिसे सामान्यत: शिशु के जन्म के बाद फेंक दिया जाता है। स्टेम सेल के इस समृद्ध ख़जाने का नाम है- गर्भनाल और प्लेसेंटा पर बचा रक्त। स्टेम सेल बैंकिंग में इसी स्रोत को भविष्य के उपयोग के लिए सहेज लिया जाता है। वेस्ट का इससे बेस्ट उपयोग और क्या हो सकता है?
भ्रूणीय स्टेम सेल के 5,000 प्रोटीन पहचाने जा चुके हैं और इससे 75 से भी अधिक बीमारियों का इलाज संभव है। बैंकिंग की प्रक्रिया में कोशिकाओं को क्रायोजेनिक तरीके से (-196°c तापमान पर) कई वर्षों के लिए संरक्षित करके रखा जा सकता है। प्रयोगशाला में कोशिका को उपयुक्त पोषक पदार्थ और वृद्धि कारकों की उपस्थिति में संवर्धित किया जाता है, जिससे विशिष्ट जीन सक्रिय होते हैं, कोशिका विभाजन बढ़ता है और विशेष ऊतकों का निर्माण होता है। इन ऊतकों से अंग और अंग से अंग तंत्र बनते हैं। स्टेम सेल्स का उपयोग कर बनाए गए अंगों की आनुवांशिक संरचना में रत्ती-भर भी विविधता नहीं होती।
आखिर ऐसा क्या जादू है इन कोशिकाओं में, जो इन्हें इतना महत्व दिया जा रहा है? जवाब है- इनकी स्वत: नवीकरण की अद्भुत क्षमता। कोशिकाओं का यही गुण इन्हें रीजनरेटिव मेडीसिन्स और ऊतक व अंगों के ट्रांसप्लांटेशन का बेहतरीन विकल्प बनाता है। स्टेम सेल्स, कोशिकाओं और ऊतकों का अक्षय भंडार है। इन कोशिकाओं से आप पेंक्रियाज़, लीवर, मांसपेशी, हड्डी, रक्त, त्वचा या तंत्रिका तंत्र, जो मर्जी हो, वो बना सकते हैं।
स्टेम सेल्स के उपयोग का सबसे बड़ा फ़ायदा यह है कि ये कोशिकाएँ हमारे अपने शरीर की होती हैं तथा हमारा प्रतिरक्षा तंत्र इन्हें बाहरी समझकर अस्वीकार नहीं करता। यह तकनीक उन स्थितियों में भी बहुत कारगर है, जहाँ अंग प्रत्यारोपण संभव नहीं होता, जैसे लीवर या गॉल ब्लैडर के कैंसर (ये अंग शरीर में जोड़े में नहीं होते अत: कैंसर की अंतिम अवस्था में पता चलने पर इन्हें काटकर अलग नहीं किया जा सकता) या अंतिम अवस्था में ब्लड कैंसर का पता चलने पर। रक्त कोशिका बनाने वाली (हीमोपोएटिक) स्टेम सेल का उपयोग आजकल ब्लड कैंसर और एनीमिया के उपचार में किया जा रहा है।
अल्ज़ाइमर, एड्स, स्ट्रोक, बर्न (जलना), हृदय की बीमारियाँ, गठिया और ब्लॉकेज का इलाज बहुत आसान हो गया है। ल्यूकेमिया, हिस्टियोसाइटिक और फ़ेगोसाइटिक डिसऑर्डर, प्रतिरक्षा तंत्र, प्लेटलेट्स, आरबीसी, प्लाज़्मा सेल और चयापचय की असामान्यताएँ, पीठ व कमर के दर्द, बुढ़ापे के कारण होने दृष्टि-दोषों, कैंसर, पार्किंसन, डायबिटीज़, स्पाइनल कॉर्ड को होने वाली क्षतियों और कई प्रकार के आनुवांशिक रोगों और ट्यूमर को हमेशा के लिए ठीक किया जा सकता है। विज्ञान हमेशा से ही कौतूहल का विषय रहा है। यह पढ़कर आश्चर्य मत कीजिए कि स्टेम सेल से दिल का वॉल्व, फेफड़ा, धमनियाँ, उपास्थि, मूत्राशय और कृत्रिम शुक्राणु भी बनाया जा चुका है। स्टेम सेल से स्वस्थ और सक्रिय हृदय पेशियाँ बनाकर गंभीर हृदय रोगों से जूझ रहे मरीजों में सीधे ट्रांसप्लांट की जा सकती हैं या इंसुलिन का निर्माण करने वाली पेंक्रियाज़ की बीटा कोशिकाएँ डायबीटिज़ के रोगियों में ट्रांसप्लांट की जा सकती हैं।
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