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शरीर का बायोकेमिकल लोचा और योग
लगातार तनाव में रहने वाले लोगों की शारीरिक प्रवृत्ति अम्लीय हो जाती है। ऐसी स्थिति में कोशिकाओं के लिए ऑक्सीजन लेना कठिन हो जाता है। अम्लीय अवस्था में कोशिकाओं में अनावश्यक तोड़-फोड़ शुरू हो जाती है। इस केटाबॉलिज़्म के कारण विभिन्न प्रकार के हानिप्रद रसायन छोड़े जाते हैं, जिससे रक्त अशुद्ध और विषाक्त हो जाता है।

यह प्रदूषित रक्त पूरे शरीर में बहता है जिससे कोशिकाओं, विशेषत: दिमाग की कोशिकाओं को थकान होती है। यही अम्लीयता आमाशय में जाकर अल्सर का कारण बनती है। योग शरीर के अंत:स्रावी तंत्र को लाभदायक रसायन स्रावित करने के लिए उत्तेजित करता है और हमें इन दुष्परिणामों से बचाता है।

योग से साँस को शरीर में अधिक समय तक रोककर रखने का अभ्यास होता है। श्वास के अभ्यास से द्रव्य (फ्लूइड) परिवहन बढ़ता है और फेफड़े मजबूत होते हैं। त्वचा का गैल्वेनिक प्रतिसाद तथEEG (इलेक्ट्रोएन्सिफ़ेलोग्राफ़ी) की अल्फ़ा तरंगें बढ़ती हैं। योगासनों के कारण होने वाले खिंचाव से फेसिया का आकार बढ़ता है। फेसिया सार्कोमीयर (एकल मांसपेशी कोशिका) और मांसपेशियों को जोड़ने वाले संयोजी ऊतक का रक्षात्मक आवरण है। आणविक स्तर पर फेसिया स्टील से भी ज़्यादा मजबूत होता है। योग से हड्डियों का आकार तक बदल सकता है। योग के कारण होने वाले मांसपेशीय खिंचाव से रक्त-परिवहन में लैक्टिक अम्ल छोड़ा जाता है, जिससे मांसपेशीय थकान नहीं होती। यह जोड़ों, लिगामेंट्स और टेंडन को लचीला, चिकना और मजबूत बनाता है।

ये तो केवल कुछ ही उदाहरण हैं। योग के ऐसे न जाने कितने जैव-रासायनिक प्रभावों से परदा उठना बाकी है अभी...

मनुष्य को प्राचीन शास्त्रों द्वारा दिया गया एक नायाब तोहफ़ा है योग। अब ये हमारे विवेक पर निर्भर करता है कि हम इस विधा का कब, कैसे और कितना उपयोग करते हैं... जीवन में सेटल होने, जिम्मेदारियाँ निभाने, घर और बाहर की समस्याओं को सुलझाने और अपने लक्ष्यों को हासिल करने की धुन में कहीं हम अपने शरीर को इतना अनदेखा न कर दें कि जब तक इस पर नज़र पड़े तब तक न ऊर्जा बची हो, न शक्ति और न ही जीवन... जब तक हमें अपनी अतिव्यस्ततम दिनचर्या में से अपने शरीर को कुछ मिनट देने का ख़्याल आए तब तक कहीं ऐसा न हो कि शरीर के पास हमारे लिए ही समय न बचा हो... बच्चनजी ने ठीक ही कहा था-

‘कहाँ गया वह स्वर्गिक साकी, कहाँ गई सुरभित हाला,
कहाँ गया स्वप्निल मदिरालय, कहाँ गया स्वर्णिम प्याला!
पीने वालों ने मदिरा का मूल्य, हाय, कब पहचाना?
फ़ूट चुका जब मधु का प्याला, टूट चुकी जब मधुशाला।’
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