योग तंत्रिका-कोशिका (नर्व सेल) को त्वरित क्रियाओं के लिए ऊर्जा प्रदान करता है, रक्त-परिवहन को आसान बनाता है और शरीर की साम्यावस्था बनाए रखता है। मानव शरीर में 2 प्रकार के तंत्रिका तंत्र होते हैं-
1. अनुकम्पी (Sympathatic) तंत्रिका तंत्र, जिसे फ्लाइट और फाइट तंत्र कहते हैं, क्योंकि यह रक्तचाप, श्वासोच्छवास दर तथा शरीर में स्ट्रेस हार्मोन का प्रवाह बढ़ाता है। परीक्षा के समय, डरावनी फ़िल्में देखने या ऑफ़िस में काम के तनाव के दौरान यही हार्मोन स्रावित होता है। इस तंत्र के अत्यधिक उत्तेजित हो जाने पर अल्सर, माइग्रेन और हृदय संबंधी गंभीर बीमारियाँ भी हो सकती हैं।
2. परानुकम्पी (Parasympathatic) तंत्रिका तंत्र रक्तचाप, श्वासोच्छवास दर तथा स्ट्रेस हार्मोन का प्रवाह कम करता है। योग के दौरान गहरी साँस लेने की प्रक्रिया परानुकम्पी तंत्रिका तंत्र की क्रियाओं को प्रोत्साहित करती है। इससे शरीर को आराम और रोगों से मुक्ति मिलती है।
साथ ही यह अनुकम्पी तंत्रिका तंत्र की प्रक्रियाओं को धीमा करता है। इसीलिए डर लगने या गुस्सा आने पर गहरी साँस लेने की सलाह दी जाती है। योगिक प्रक्रियाएँ केंद्रीय और स्वायत्त तंत्रिका तंत्र पर भी असर डालती हैं। ये प्रक्रियाएँ संतुलन और मोटर तंत्रिकाओं (मस्तिष्क से शरीर के अंगों तक संवेदना ले जाने वाली तंत्रिका) के नियंत्रण में होने वाली परेशानियों से बचाती हैं।
हमारे मस्तिष्क में GABA (गामा-अमीनो ब्यूटायरिक एसिड) नामक एक रसायन होता है। GABA का घटा हुआ स्तर कई मानसिक स्थितियों, जैसे अवसाद, उत्कंठा या व्यग्रता के लिए जिम्मेदार है। योग मस्तिष्क में इस रसायन का स्तर बढ़ाकर इन विसंगतियों से हमें बचाता है। एक अन्य रसायन DHEA (डीहाइड्रोइपीएंड्रोस्टीरोन) के कम स्तर से एकाग्रता में कमी आती है, योग इसका स्तर भी सामान्य बनाए रखता है।
योग मस्तिष्क को सदमे से होने वाली क्षति या मानसिक आघात से उबरने में मदद करता है। योग का मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी होता है। इससे बुद्धिमत्ता, आत्मविश्वास, उत्साह, सकारात्मकता, अंतर्ज्ञान, रचनात्मकता, एकाग्रचित्तता, याददाश्त और सीखने की क्षमता बढ़ती है और मूड अच्छा बना रहता है।
योग स्ट्रेस हार्मोन पर नियंत्रण रखने वाले कॉर्टिसोल को नियंत्रित करता है। कॉर्टिसोल न्यूरोट्रांसमीटर के संतुलन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। योग फ़्री-रेडिकल्स से होने वाली क्षतियों जैसे कि कोशिका झिल्ली और कोशिकांगों की टूट-फूट से भी बचाता है। यह तंत्रिका तंत्र को स्थायी बनाता है, प्रजनन संबंधी, ऑटोइम्यून तथा उदर और आँत की बीमारियाँ दूर करता है, अंत:स्रावी तंत्र को नियमित रखता है तथा ग्रंथियों को उत्तेजित करता है। सहनशक्ति, ऊर्जा स्तर, कार्डियो-वास्कुलर दक्षता, प्रतिक्रिया समय, आँख और हाथों का समन्वय और नींद बढ़ाता है।
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