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शरीर का बायोकेमिकल लोचा और योग
- नेहा कवठेक

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योग का अर्थ है शरीर, मस्तिष्क और आत्मा को जोड़ना। योग की आत्मा को ‘योग’ के शरीर से निकालकर लाने वाले स्वामी रामदेव के शब्दों में ‘योग एक जीवन जीने की कला, योग एक जीवन जीने की विधा, योग एक वो परिकल्प है, जिससे हम अपने अस्तित्व, अपनी चेतना से जुड़ते हैं, गहरे

आज भी योग उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना ऋषि-मुनियों के ज़माने में हुआ करता था। परंतु बदलती हुई परिस्थितियों के साथ योग की आवश्यकता और बढ़ गई है। दूसरों से आगे निकलने की दौड़ में संघर्ष, प्रतियोगिता, तनाव, अवसाद और निराशा जैसे रोड़े हमने स्वयं खड़े किए हैं। हमने अपने जीवन को इतना कठिन बना लिया है कि आने वाली पीढ़ियों को शायद ये ही न पता हो कि सामान्य जीवन क्या होता है...

शास्त्रों के अनुसार सृष्टि में 84 लाख योनियाँ हैं और इन सभी में मनुष्य योनि सर्वश्रेष्ठ है। यह जीवन और यह शरीर हमें एक ही बार मिला है। प्रकृति की इस अनमोल धरोहर को सुंदर और स्वस्थ बनाने की जिम्मेदारी हमारी है... और इस जिम्मेदारी को बख़ूबी निभाने में हमारा सच्चा साथी है- योग। योग वैकल्पिक चिकित्सा विज्ञान के रूप में उभरकर सामने आ रहा हैडॉक्टरों और अस्पतालों के अनाप-शनाप खर्चों, अन्य चिकित्सा पद्धतियों पर निर्भरता और दवाइयों के साइड-इफ़ेक्ट्स, सभी मर्जों की एक ही दवा है- योग।
  योग का अर्थ है शरीर, मस्तिष्क और आत्मा को जोड़ना। योग की आत्मा को ‘योगा’ के शरीर से निकालकर लाने वाले स्वामी रामदेव के शब्दों में ‘योग एक जीवन जीने की कला, योग एक जीवन जीने की विधा, योग एक वो परिकल्प है, जिससे हम अपने अस्तित्व,अपनी चेतना से जुड़ते हैं।      


आधुनिक समाज में यह मान्यता घर कर गई है कि योग का विज्ञान से नहीं, केवल धर्म और अध्यात्म से ही नाता है। हमारे इस पढ़े-लिखे समाज ने यह मान लिया है कि एलोपैथी जैसी चिकित्सा पद्धति ही वैज्ञानिक और प्रामाणिक है। हमारा दिल और दिमाग हर बात को वैज्ञानिक संदर्भ से समझने का आदी हो गया है। अगर ऐसा ही है तो आइए योग को विज्ञान से जोड़कर देखा जाए...

योग शरीर की बायोकैमेस्ट्री पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से प्रभाव डालता है। यह शरीर की प्रत्येक कोशिका को ऊर्जा और सक्रियता से भर देता है और उनमें जीवन का संचार करता है। योगिक क्रियाएँ दरअसल बायोकेमिकल और फिज़ियोलॉजिकल प्रक्रियाओं का समन्वय ही हैं।

योगासनों में हाथ को बहुत महत्वपूर्ण अंग माना गया है। हथेलियों और उँगलियों में बहुत-सी तंत्रिकाओं के सिरे होते हैं, जिनसे लगातार बायोइलेक्ट्रिक ऊर्जा निकलती रहती है। उँगलियों के पोरों पर स्थित कुछ विशिष्ट बिंदुओं को स्पर्श करने या दबाने से ऊर्जा का परिपथ (सर्किट) पूरा होता है। योग की मुद्राएँ किसी विशेष तंत्रिका या तंत्रिका गुच्छ को सक्रिय करके विशेष सिग्नलों को उत्तेजित करती हैं। इसलिए इन मुद्राओं का अत्यधिक मानसिक और शारीरिक प्रभाव होता है।
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