* सभी दूरियों के लिए स्पष्ट दृष्टि।
* बिना चश्मे के स्पष्ट दृष्टि।
* अनावश्यक चकाचौंध के स्पष्ट दृष्टि।
* इन अपेक्षाओं को दृष्टिगत रखते हुए नए मल्टी फोकल लेंस का प्रयोग एक अच्छा उपाय है। | | मल्टी फोकल लेंस जिन मरीजों को लगाते हैं, उनकी व्यक्तिगत कौंसिलिंग की जाती है, उन्हें यह आवश्यक रूप से बताया जाता है कि मल्टी फोकल लेंस के बावजूद काफी कम नंबर के चश्मे की आवश्यकता पड़ सकती है |
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* आज कई तरह के मल्टी फोकल लेंस उपलब्ध हैं- जैसे रेस्टोर, रीझूम, टैक्निस आदि।
* तकनीकी रूप से मल्टी फोकल लेंस दो तरह के होते हैं।
1. डिफरेक्टिव मल्टी फोकल लेंस , 2. रिफ्रेक्टिव मल्टी फोकल लेंस
* मल्टी फोकल लेंस में विभिन्न हिस्सों से विभिन्न दूरियों की किरणें प्रदर्शित होती हैं और इस तरह मरीज को सभी दूरियों के लिए स्पष्ट दृष्टि मिलती है।
* मल्टी फोकल लेंस के इस्तेमाल के पहले मरीज की सावधानीपूर्ण स्क्रीनिंग आवश्यक होती है।
स्क्रीनिंग निम्न बिंदुओं पर आधारित होती है
1. जटिल मोतियाबिंद के मरीजों में, पर्दे की बीमारी वाले मरीजों में, जिन मरीजों में पुतली छोटी है और एक विशिष्ट दृष्टि दोष (एस्टिग्मेटिज्म) 1.50 डी 1/2 में ये लेंस नहीं लगाए जाते हैं।
2. जिन मरीजों को रात में वाहन चलाने की अत्यधिक आवश्यकता होती है, उनमें ये लेंस नहीं लगाना चाहिए।
3. मल्टी फोकल लेंस जिन मरीजों को लगाते हैं, उनकी व्यक्तिगत कौंसिलिंग की जाती है, उन्हें यह आवश्यक रूप से बताया जाता है कि मल्टी फोकल लेंस के बावजूद काफी कम नंबर के चश्मे की आवश्यकता पड़ सकती है।
मल्टी फोकल लेंस की कमियाँ
ये लेंस काफी महँगे होते हैं। मल्टी फोकल आईओएल से होने वाली चकाचौंध और रौशनी के आस-पास होने वाले प्रकाश वृत्त (रेलोज) के संबंध में अलग अलग मत है। हालाँकि इन मल्टी फोकल लेंस में यह समस्या काफी कम है।
निष्कर्ष
मोनो फोकल लेंस की तुलना में मल्टी फोकल लेंस विभिन्न दूरियों के लिए स्पष्ट दृष्टि उपलब्ध कराता है और इस तरह अधिकांश मरीजों को मोतियाबिंद के ऑपरेशन के पश्चात चश्मे की आवश्यकता नहीं पड़ती है।
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