-डॉ. प्रीति सिंह
आयुर्वेद पंचकर्म चिकित्सा पद्धति देश की प्राचीनतम चिकित्सा पद्धतियों में से एक है। देश के दक्षिणी भाग में यह बहुत लोकप्रिय है और सामान्यतौर पर लोक जीवन में स्वीकार्य है। उत्तर भारत में यह पद्धति हाल ही में उपयोग में लाई जा रही है। इस पद्धति में शरीर के विषों को बाहर निकालकर शुद्ध किया जाता है। इसी से रोग निवारण भी हो जाता है।
पंचकर्म, आयुर्वेद शास्त्र में वर्णित एक विशेष चिकित्सा पद्धति है, जो दोषों को शरीर से बाहर निकाल कर रोगों को जड़ से समाप्त करती है। यह शरीर शोधन की प्रक्रिया है, जो स्वस्थ मनुष्य के लिए भी फायदेमंद है। इसमें पाँच प्रधान कर्म होते हैं तथा इनके पहले किए जाने वाले दो पूर्व कर्म।
पूर्व कर्म
1. स्नेहन, 2. स्वेदन प्रधान कर्म (काय चिकित्सानुसार)
1. वमन, 2. विरेचन, 3. आस्थापन वस्ति, 4. अनुवासन बस्ति, 5. नस्य
शल्य चिकित्सानुसार आस्थापन तथा अनुवासन वस्ति को वस्ति शीर्षक के अंतर्गत लेकर तीसरा प्रधान कर्म माना गया है तथा पाँचवाँ प्रधान कर्म 'रक्त मोक्षण' को माना गया है।
पूर्व कर्म
1. स्नेहन- स्नेह शब्द का तात्पर्य शरीर को स्निग्ध करने से है। यह स्नेह क्रिया शरीर पर बाह्य रूप से तेल आदि स्निग्ध पदार्थों का अभ्यंग (मालिश) करके भी की जाती है तथा इन पदार्थों का मुख द्वारा प्रयोग करके भी की जाती है। कुछ रोगों की चिकित्सा में स्नेहन को प्रधान कर्म के रूप में भी किया जाता है।
चार प्रमुख स्नेह
(1) घृत, (2) मज्जा, (3) वसा, (4) तेल
इनमें घृत (गोघृत) को उत्तम स्नेह माना गया है। ये चारों स्नेह मुख्य रूप से पित्तशामक होते हैं।
2. स्वेदन- स्वेदन का तात्पर्य उस प्रक्रिया से है, जिससे स्वेद अर्थात पसीना उत्पन्न हो। कृत्रिम उपायों द्वारा शरीर में स्वेद उत्पन्न करने की क्रिया स्वेदन कहलाती है।
स्वेदन के भेद-
(अ) 1. एकांग स्वेद- अंग विशेष का स्वेदन
2. सर्वांग स्वेद- संपूर्ण शरीर का स्वेदन
(ब) 1. अग्नि स्वेद- अग्नि के सीधे संपर्क द्वारा स्वेदन
2. निरग्नि स्वेद- बिना अग्नि के संपर्क द्वारा स्वेदन।
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