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नाभि-चक्र स्वास्थ्य की धुरी
नाभि के अपने स्थान से टलने पर प्रमुखतः उदर संबंधी अव्यवस्थाएँ जैसे पेट में दर्द होना, गड़गड़ाहट की आवाजें, कब्ज रहना, गैस बनना, अतिसार आदि उत्पन्न हो जाती है। इसके अलावा आँत उतरना, हृदय रोग, मधुमेह, बवासीर, सिरदर्द, माइग्रेन, स्त्रियों के मासिक धर्म संबंधी विकार में नाभि टलना भी एक प्रमुख कारण है, अतः इन रोगों की कोई चिकित्सा या शल्यक्रिया कराने से पहले नाभि परीक्षा अवश्य करा लेना चाहिए। नाभि टली हो तो उसे यथास्थान कर देने से कई बार कष्ट दूर हो जाता है

नाभि परीक्षा कैसे?
नाभि परीक्षा योग शिक्षक से कराना चाहिए। यह संभव न हो तो व्यक्ति स्वयं अपनी नाभि परीक्षा कर सकता है। नाभि परीक्षा प्रातः शौचादि से निवृत्त होकर अल्पाहार या कोई पेय लेने से पूर्व करना चाहिए। इस समय आँतें खाली होती हैं। नाभि परीक्षा से पूर्व एक लीटर कुनकुने पानी का एनिमा ले लिया जाए, तो ज्यादा अच्छा है। शांत वातावरण में समतल जमीन पर कंबल बिछाकर उस पर पीठ के बल लेट जाएँ। सिर से लेकर पैर तक शरीर सीधा रहे। हाथ शरीर के पास जमीन पर, हथेलियाँ आकाश की ओर खुली अवस्था में रखें। आँखें एवं मुँह बंद कर लें। सारे शरीर को शिथिल एवं मन को शांत करें। इसके लिए दस बार श्वसन करें। प्रत्येक बार नाक से धीरे-धीरे लंबी, गहरी साँस अपने भीतर लें, पश्चात धीरे-धीरे साँस छोड़ें। यह शवासन की तैयारी की स्थिति है। अब अपने एक हाथ के अँगूठे और उँगलियों के सिरों को मिलाकर अथवा तर्जनी उँगुली को उदर के मध्य स्थित नाभि की घुंडी पर चित्र में बताए अनुसार रखकर हल्का-सा दबाव दें। उँगलियों के नीचे नाभि की घुंडी में हृदय की धड़कन जैसा स्पंदन अनुभव होगा। यही आपका नाभि चक्र है। यही इसकी सही स्थिति है। यदि यह स्पंदन नाभि के ठीक नीचे के बजाए कुछ इधर-उधर या ऊपर-नीचे अनुभव हो तो नाभि स्थानच्युत है। जिस स्थान पर धड़कन सुनाई दे उसी स्थान पर नाभि टली है।

नाभि टलने की स्थिति के आधार पर रोग का निदान किया जा सकता है। यदि नाभि ऊपर की ओर हटी हो तो कब्ज हो जाता है, पेट में गैस बनने लगती है, हृदय रोग हो जाते हैं। नाभि नीचे की ओर टलने पर अपचन, पेटदर्द के साथ गड़गड़ाहट होने लगती है। यदि नाभि बगल मेंहटी हो तो पेट में तीव्र पीड़ा आरंभ हो जाती है। नाभि यथास्थान कर देने से तुरंत लाभ मिलता है। यह अनुभव है कि आमतौर पर पुरुषों की नाभि बाईं ओर तथा स्त्रियों की नाभि दाईं ओर टला करती है।

नाभि में लंबे समय तक अव्यवस्था चलती रहती है तो उदर विकार के अलावा व्यक्ति के दाँतों, नेत्रों व बालों के स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ने लगता है। दाँतों की स्वाभाविक चमक कम होने लगती है। यदाकदा दाँतों में पीड़ा होने लगती है। नेत्रों की सुंदरता व ज्योति क्षीण होने लगती है। बाल असमय सफेद होने लगते हैं।
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