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क्या है प्राइमल थैरेपी?
हुब्बार्ड ने हजारों लोगों की सहायता की है। जैसे एक आदमी बचपन की किसी स्मृति में अटक गया है और ठीक से बोल नहीं पाता तो टाइम ट्रेक के जरिए उसके 'इन्ग्रेन्स' खुलेंगे और वह छः वर्ष का हो जाएगा। इस तरह रुकी धारा का सिलसिला चालू हो जाएगा और वह सही अर्थों में युवा या प्रौढ़ हो सकेगा। हैरानी की बात तो यह है कि जहाँ सैकड़ों दवाइयाँ उस आदमी को बोलने में समर्थ नहीं बना सकती हैं वहाँ वह टाइम ट्रेक पर लौटकर बोलने में समर्थ हो सकता है। भारत में ओशो ने जेनौब की प्राइमल थैरेपी को और भी परिष्कृतकर 'ओशो प्राइमल थैरेपी' की रचना की है। ओशो कम्यून पुणे में इसके प्रयोग पिछले 24 वर्षों से नियमित हो रहे हैं। इसका मूल उद्देश्य जहाँ व्यक्ति के बचपन के मानसिक घावों व कटु अनुभवों के साथ-साथ सामाजिक रूढ़ संस्कारों से मुक्त कराना है वहीं उसके भीतर के बालक को उघाड़कर आनंद, जीवंतता, सहजता व आश्चर्य विमुग्धता जैसे गुणों को वापस लौटाना है। इस प्रक्रिया से बचपन के अधूरे कृत्यों व अनुभवों से भी छुटकारा मिलता है।

स्वामी आनंद देवपथ ओशो मल्टीवर्सिटी पुणे में प्राइमल थैरेपी ग्रुप के संचालक हैं। उनका कहना है कि यदि हम भावों को दबाते चले जाते हैं तो वे बीमारी पैदा कर सकते हैं। गुस्से का दमन करने से बरसों बाद हार्ट अटैक की संभावना हो सकती है। परंतु वर्तमान युग की आपाधापी व महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति में व्यक्ति इतना मशगूल रहता है कि वह अपने आंतरिक विकास की ओर कतई ध्यान नहीं दे पाता। चालीस की उम्र तक पहुँचते-पहुँचते उसे जीवन खाली-खाली व निरर्थक महसूस होने लगता है। जीवन का यह मध्य अवस्था संकट उसमें छटपटाहट व असंतोष पैदा करके कुछ सोचने-समझने को मजबूर कर देता है। यही सही समय है प्राइमल थैरेपी प्रक्रिया में उतरने का। पुणे में इस समूह मनोचिकित्सा में विभिन्न संस्कृतियों एवं सामाजिक संस्कारों वाले कई देशों के लोग हिस्सा लेते हैं। विभिन्ना तकनीकों द्वारा व्यक्ति को उसके व्यक्तित्व की पर्तों को उघाड़कर उसके बचपन तक लौटाया जाता है। यह मनोचिकित्सा ध्यान में गहरे डूबने के लिए एक छलाँग या सेतु की तरह उपयोग में लाई जा सकती है।

प्राइमल फीलिंग ग्रुप थैरेपी से गुजरी लॉरेन माली नामक तैंतीस वर्षीय एक विदेशी युवती की कहानी उसी की जुबानी सुनिए- 'मेरा बचपन पिट्सबर्ग में गुजरा। मैं अपने पिता से बहुत डरती थी क्योंकि वे शराबी थे। धीरे-धीरे मेरे पिता इतना नशा करने लगे कि मेरी माँ ने न केवल उनका व्यवसाय संभाला वरन उनकी चार बहनों के साथ उनका भी लालन-पालन किया। पिता के प्रति मेरा अनादर धीरे-धीरे घृणा में बदल गया। वे भी मुझे नहीं चाहते थे व अक्सर डाँटते रहते थे। बचपन की एक घटना को मैं आज भी नहीं भूल पाई हूँ। मैं अपनी बहनों के साथ टीवी पर ओलिंपिक खेल देख रही थी। सहसा मेरे पिता ने कमरे में प्रवेश किया। मुझे देखते ही उन्होंने मुझे झिड़का और कमरे के बाहर जाने को कहा और गरजकर कारण बताया कि मेरी उपस्थिति में वे ओलिंपिक खेलों का आनंद नहीं ले सकते। घर में इस वातावरण के चलते मुझे स्कूल में भी अच्छा नहीं लगता व मैं वहाँ भी तिरस्कृत होती चली गई। चौदह की उम्र आते-आते मुझे भी ड्रग व शराब की लत पड़ गई। किसी तरह मैंने अपनी पढ़ाई पूरी की और कुआलालंपुर में नौकरी कर ली। तैंतीस वर्ष की उम्र में मुझे ओशो प्राइमल थैरेपी की जानकारी मिली और मैं भागकर पूना आ गई।

लॉरेन माली को विश्वास नहीं था कि ओशो कम्यून के पाँच दिवसीय प्राइमल थैरेपी ग्रुप में वह अपने त्रासद बचपन के घावों से कैसे मुक्त होगी? परंतु चिकित्सक देवपथ के सुझावों पर ईमानदारी से अमल करने पर वह अपने व्यक्तित्व की पर्तों को पार कर नन्ही, निष्कलुष बच्ची से साक्षात्कार कर सकी। सर्वप्रथम तो रेचन की कसरतें करने से क्रोध, प्रतिशोध व नफरत के नकारात्मक भाव सतह पर आ गए व इस धक्के से वह हिल-सी गई, परंतु बाद में वह सामान्य व शांत हो गई। उसे अनुभव हुआ कि जैसे उसका नया जन्म हो गया है। हेम्बर्ग, जर्मनी के न्यूरोलॉजिस्ट एवं मनोचिकित्सक प्रोफेसर डॉ. मिचेल हॉलर ने भी 4 वर्ष पूर्व ओशो कम्यून पुणे में प्राइमल थैरेपी ग्रुप में भाग लिया और अनुभव किया कि इस मनोचिकित्सा से गुजरने के बाद आंतरिक विकास व माता-पिता के संबंधों में एक नई दिशा मिलती है।
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