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यह शायद शब्द ही हैं जो
आवाज करने लगते हैं दूर से आते शोर में
कविता में उतरने के लिए
कभी आकाश तो कभी पाताल से
सूर्य के प्रकाश में छोटे-छोटे धूल के कणों पर
वे सिर पैर बैठे उड़ रहे हैं
मैं इनका पीछा करती हूं तो
वह भागने लग जाते हैं
जाड़ा आ रहा है पत्ते झड़ रहे हैं
पेड़ों को नए शब्दों से लिपटा हुआ
देखती हूं शाखाओं के भीतर. ...।
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सौजन्य से - अक्षर पर्व
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