ब्याह की यह शाम,आधी रात को भांवर पड़ेगी।आज तो रो लो तनिक, सखि!गूंजती हैं ढोलकें-औ' तेज स्वर में चीखते-से हैं खुशी के गीत।बंद आंखों को किए चुपचाप,सोचती होगी कि आएंगे नयन के मीत।सज रहे होंगे अधर पर हास,उठ रहे होंगे हृदय में आश औ'विश्वास के आधार।नाचते होंगे पलक पर-दो दिनों बाद के- आलिंगनों के,चुंबनों के वे सतत व्यापारजिंदगी के घोर अनियम में, अनिश्चय मेंनहीं हैं मानते जो हार।किंतु संध्या की उदासी मिट नहीं पाती,बजें कितने खुशी के गीत।और जीवन के अनिश्चय बन न पातेकभी निश्चयहाय! क्रम इस जिंदगी के-साध के विपरीत।सांवली इस शाम की परछाइयां कुछ देर मेंआकाश पर तारे जड़ेंगी,अश्रुओं के तारकों को तुम संजो लो।आज तो रो लो तनिक, सखि!ब्याह की यह शाम,आधी रात को भांवर पड़ेगी।किसी सूनी सी कोठरी में बैठकर तुम,दो क्षणों को ध्यान प्रिय का छोड़-व्यस्त घर के शोर औ' हलचल भरेवातावरण में डूब जाओगीमनोरम स्वप्न-गढ़ को तोड़।लोक-लज्जा से बंधा तन, रोक देगा पथ तुम्हारा,काम करने को बढ़ेंगे चपल चरण अधीर।तुम सिमटकर अनमनी-सी बैठ जाओगी,घुलाती मोद के वातावरण में एक बेसुध पीर!द्वार पर बजती हुई शहनाइयों की गूंज भीमिट जाएगी,उस शाम के बढ़ते अंधेरे में,अकेली कोठरी में,कौन जाने किन दिनों की बात तुमको घेर लेगी।चित्र बीती जिंदगी के,या विहंसती भांवरों की रात के, सौ बार नाचेंगे।कि दुनिया प्यार के अनजान रंगों में सजेगी।शाम की खामोश छायाएं-कंकरियां बन पलक में आ गड़ेंगी!चलो उठकर आंख तो धो लो तनिक, सखि!आज तो रो लो तनिक, सखि!ब्याह की यह शाम,आधी रात को भांवर पड़ेगी।
सौजन्य से - समकालीन साहित्य समाचार