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एक बार फिर से
नदी बहने लगी है
और पानी बढ़ने लगा है
सागर भी छलकने
लगा है
गंध और गंधमयी
होकर बिखर गई है
पता नहीं ऐसा
कैसे हुआ
शायद ये तुमसे
मिलने का असर है
पत्तों का हरा रंग
और हरा हो गया है
हवा का स्पर्श
और मखमली हो गया है
और सफेद पत्थर
इधर-उधर उगने लगे हैं
मैंने पूछा खुद से
कि क्या हो गया है
शायद ये झर-झर
कर बहती हुई
तुम्हारी बातों के
असर से ही हुआ है
हर तरफ से
फूटती है रोशनी
जैसे- रोशनी ने
एक चेहरा बना लिया हो
हां- चेहरा कोई प्रलेप नहीं है
जिसे आत्मा को
चारदीवारी पर अंकित
कर दिया जाए
ये तो अपना आप है
जिसे आप स्वीकार करते हैं
एक प्रकाश पुंज है
जो फैलता जाता है
चेहरे की मखमली फिजां पर
और फिर
सावन की बूंदें
हरियाली का जेवर
मिट्‍टी की खुशबू
फूलों की गंध
ये सब चेहरे का
वास्तविक रूप बन जाता है
शायद या फिर
यूं ही-
मुझे इसका पता तुम्हारी बातों
ने ही बताया है या कहा है
पता नहीं...।
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