हिन्दी व्यंग्य में अनोखा प्रयोग : व्यंग्य की जुगलबंदी

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हिंदी साहित्य में को लेकर बहुत ज्यादा प्रयोग देखने को नहीं मिलते है और जो अभी तक हुए हैं, उनका भी सही से मूल्याकन नहीं हो पाया है। लेकिन फिर भी व्यंग्यकारों ने से एक अनोखा प्रयोग किया - व्यंग्य की जुगलबंदी।

 
इससे पहले इस प्रकार की जुगलबंदी ईश्वर शर्मा और लतीफ घोघी के द्वारा की जा चुकी थी। यह जुगलबंदी व्यंग्य के क्षेत्र में एक अनूठा प्रयोग था। लतीफ घोंघी और ईश्वर शर्मा ने व्यंग्य के नियमित स्तंभ के रूप में एक ही विषय पर व्यंग्य लिखे। उनको अमृत संदेश, रायपुर और अमर उजाला बरेली-आगरा अखबारों ने प्रकाशित किया। बाद में 1987 में सत्साहित्य प्रकाशन, दिल्ली ने इस जुगलबंदी को छापा।
 
इसबार व्यंग्य की जुगलबंदी के तहत चार लेखकों अनूप शुक्ल, निर्मल गुप्ता, रवि रतलामी और एम.एम.चन्द्रा ने एक साथ जुगलबंदी की। इस जुगलबंदी को एक साथ आप के सामने प्रस्तुत कर रहे हैं, ताकि इस प्रयोग  के बारे में एक सही मूल्यांकन हो सके।
 
पहली जुगलबंदी - अनूप शुक्ल : मोबाइल
आज की दुनिया मोबाइलमय है। समाज सेवा के नाम पर सरकारें बनाने के काम से लेकर अपराध का धंधा करने वाले माफि‍या लोग पर इस कदर आश्रित हैं,कि इसके बिना उनके धंधे चौपट हो जाएं।
 
बिना मोबाइल का आदमी खोजना, आज के समय में कायदे की बात करने वाले किसी जनप्रतिनिधि को खोजने सरीखा काम है। जितनी तेजी से मोबाइल की जनसंख्या बढ़ी है उतनी तेजी से इन्सान के बीच के दूरी के अलावा और कुछ नहीं बढ़ा होगा। आज के समय में आदमी बिना कपड़े के भले दिख जाए, लेकिन बिना मोबाइल के नहीं दि‍खता। गरज यह, कि बिना आदमी के दुनिया का काम भले चल जाए, लेकिन बिना मोबाइल के आदमी का चलना मुश्किल है।
 
मोबाइल ने लोगों के बीच की दूरियां कम की हैं। झकरकटी बस अड्डे के पास जाम में फंसा आदमी, लंदन में ऊंघती सहेली से बतिया सकता है। भन्नानापुरवा के किचन में दाल छौंकती महिला अपने फेसबुक मित्र को कुकर की सीटी से निकली भाप की फोटो भेज सकती है। गरज यह कि दुनिया में घूमता-फि‍रता आदमी बड़े आराम से दुनिया को मुट्ठी में लिए घूम सकता है।
 
जितनी दूरियां कम की हैं, बढ़ाई भी उससे कम नहीं हैं इस औजार ने। आमने-सामने बैठे लोग अगर अपने-अपने मोबाइल में डूबे नहीं दिखते, तो अंदेशा होता है कि कहीं वे किसी और ग्रह के प्राणी तो नहीं। एक ही कमरे में बैठे लोगों के बीच अगर संवाद कायम नहीं है, तो इसका मतलब यही समझा जा सकता है कि उस कमरे में मोबाइल नेटवर्क गड़बड़ है।
 
मोबाइल ने बिना शर्मिंदगी के झूठ बोलना सुगम बनाया है। नाई की दुकान पर दाढ़ी बनवाता आदमी अपने को दफ्तर में बता सकता है। बगल के कमरे में बैठा आदमी अपने को सैकड़ों मील दूर होने की बात कहकर मुलाकात से बच सकता है। घंटी बजने पर फोन उठाकर बात करने की बजाए, तीन दिन बाद कह सकता है –" अभी तेरा मिस्डकाल देखा। फोन साइलेंट पर था। देख नहीं पाया।" 
 
समय के साथ आदमी की औकात का पैमाना हो गया है मोबाइल। फोर्ड कार वाले आदमी को मारुति कार वाले पर रोब मारने के लिए, उसको बहाने से सड़क पर लाना पड़ता था। मोबाइल ने रोब मारने का काम आसान कर दिया है। आदमी अपनी जेब से एप्पल का नया आईफोन निकालकर मेज पर धरकर वहीं रुतबा काबिल कर सकता है, जो रुतबा गुंडे लोग बातचीत के पहले अपना कट्टा निकालकर मेज पर धरकर गालिब करते थे।
 
मोबाइल और इंसान समय के साथ इतना एकात्म हो गए हैं, कि एक के बिना दूसरे की कल्पना मुश्किल हो गई है। किसी आदमी को खोजना हो तो उसका फोन खोजना चाहिए। इंसान अपने फोन के एकाध मीटर इधर-उधर ही पाया जाता है।
 
मोबाइल के आने से दुनिया में बहुत बदलाव आए हैं। कभी अपने जलवे से मोबाइल की दुनिया का डॉन कहलावे वाले नोकिया के हाल, आज मार्गदर्शक मंडल सरीखे बस आदर देने लायक रह गए हैं। किलो के भाव मिलने वाले मोबाइलों से लेकर एक किले तक की कीमत वाले मोबाइल हैं आज बाजार में। 
 
तकनीक की साजिश से खरीदते ही पुराना हो जाता है मोबाइल। सामने की जेब से अलमारी के कोने तक पहुंचने की यात्रा जितनी तेजी से पूरी करता है उतनी तेजी से बस नेता लोग अपना बयान भी नहीं बदल पाते।
 
मोबाइल का एक फायदा यह भी है कि इसके चलते देश की तमाम समस्याओं से देश के युवाओं का ध्यान हटा रहता है। वे मोबाइल में मुंडी घुसाए अपना समय बिताते रहते हैं। मोबाइल न हो तो वे अपनी मुंडी घुसाने के लिए किसी और उचित कारण के अभाव में बेकाबू हो सकते हैं।
 
मोबाइल कभी बातचीत के काम आते हैं। आजकल मोबाइल का उपयोग इतने कामों में होने लगा है कि बातचीत का समय ही नहीं मिलता। फोटो, चैटिंग, के अलावा लोग मारपीट के लिए अद्धे-गुम्मे की जगह अपने पुराने मोबाइलों पर ज्यादा भरोसा करने लगे हैं। टाइगर वुड्स की प्रेमिका ने वुड्स की बेवफाई की खबर पाने पर अपने मोबाइल का हथियार के रूप में प्रयोग करके इसकी शुरुआत की थी। ऐसा फेंक कर मारा था मोबाइल कि टाइगर वुड्स का दांत टूट गया था। भारत-पाक सीमा पर भी देश के पुराने मोबाइल इकट्ठे करके फेंककर मारे जा सकते हैं। अपना कूड़ा भी उधर चला जाएगा और जलवा भी कि हिदुस्तान इतना काबिल मुल्क है कि मारपीट तक में मोबाइल प्रयोग करता है।
 
किसी भी देशभक्त कथावाचक की दिली तमन्ना की तरह बस यही बताना बचा है मेरे लिये कि दुनिया में यह तकनीक भले ही कुछ सालों पहले आई हो लेकिन अपने भारतवर्ष में महाभारतकाल के लोगों को मोबाइल तकनीक की जानकारी थी। महाभारत की मारकाट के बाद पांडव जब स्वर्ग की तरफ गए थे, तो साथ में अपना कुत्ता भी ले गए थे। वास्तव में वह कुत्ता पांडवों का वोडाफोन मोबाइल था। पांच भाइयों की साझे की पत्नी की तरह उनके पास साझे का मोबाइल था। जब देवदूत युधिष्ठर को अकेले स्वर्ग ले जाने की कोशिश करने लगे, तो उन्होंने बिना कुत्ते के स्वर्ग जाने से मना कर दिया। अड़ गए। बोले-“ ऐसा स्वर्ग हमारे किस काम का जहां मेरा मोबाइल मेरे पास न हो। अंत में देवदूत युधिष्ठर को उनके मोबाइल समेत स्वर्ग ले गया।
 
महाभारत काल में सहज उपलब्ध मोबाइल तकनीक को हजारों साल चुपचाप छिपाए धरे रहे और इंतजार करते रहे कि जैसे ही कोई विदेशी इसको चुराकर मोबाइल बनाएगा हम फटाक से महाभारत कथा सुनाकर बता देंगे, कि जो तुम आज बना रहे हो वो तो हम हज्जारों साल पहले बरत चुके हैं।
 
महाभारत काल में सबसे पहले प्रयोग किए मोबाइल का हजारों साल बाद फिर से चलन में आना देखकर यही कहने का मन करता है-“ जैसे मोबाइल के दिन बहुरे, वैसे सबसे बहुरैं।“

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