सचिन के नाम एक खत...

ऋषि गौतम

संदीपसिंह सिसोदिया|
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प्रिय सचिन,

आप मुझे नहीं जानते हैं,शायद कभी जान भी नहीं पाएंगे। आज जब आपने को अलविदा कह दिया है तो इस मौके पर अपने दिल में पलने वाले,आपसे जुड़ी भावनाओं को मैं आपसे बांटना चाहता हूं। क्या पता रोटी,कपड़ा और मकान की जद्दोंजहद के बीच बाद में फिर कभी मौका न मिले। क्योंकि पृथ्वी के इस असंख्य जीवों में से एक छोटी जी जान मैं भी हूं। एक नामुराद सी धड़कन मेरे दिल में भी है। मेरी आंखों में भी पलते हैं कुछ सपने। कुछ जिक्षासाएं,कुछ कुंठाएं और कुछ कामयाबियों के भ्रम मेरे भी अंदर हैं।
यहां मुझे यह स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं है कि मुझे क्रिकेट के बारे में कुछ भी नहीं पता। बावजूद इसके आपको खेलते देखना मेरी आखों को बहुत भाता है। मैंने कभी किसी के छ्क्के मारने पर,किसी के शतक पूरा होने पर ताली नहीं पीटी,खुशियां नहीं मनाई और न ही आउट होने पर कभी उदासियों के भंवर में डू्बा।

बावजूद इसके पता नहीं क्यों जब भी आप क्रिकेट के मैदान पर होते थे और वक्त बेवक्त मेरी निगाह उसपर पड़ जाती थी तो मैं भी कुछ देर के लिए ढहर जाता था। बिना पलकें झपकाए मेरी नजरें टीवी स्क्रीन से जैसे चिपक जाती थी। इतना ही नहीं जब कभी भी मेरे कान में आपसे जुड़ी कुछ भी बातें पहुंचती थी तो बड़े ही चाव से मैं उसे सुनता भी था। पता नहीं ऐसा क्या जादू है आपमें।
तभी तो जिस दिन यह खबर आई कि अब आप इस खेल में अपने अंत की शुरुआत कर चुके हैं तो मेरे दिल ने कहा कि काश,कहीं ऐसा होता कि इस दुनिया की सैकड़ों गलत खबरों की तरह यह भी झूठा साबित होता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

मुझे भी पता था कि ऐसा नहीं होगा,क्योंकि कुछ सत्य इतने सार्थक होते हैं कि वह कभी नहीं बदलते। साढ़े 6 अरब लोगों की इस दुनिया में आपके दिल से निकला यह भी एक ऐसा ही सत्य था। मेरी चाहत तो बस आपके करोड़ों प्रशंसकों की तरह मेरे अंदर भी पलने वाला जादू का नशा था जो यह चाहता था कि काश ऐसा हो जाए।
अब यह कहा जा रहा है कि अब आप क्रिकेट के नेपथ्य में चले जाएंगे। लेकिन क्या आपका जाना सिर्फ इस खेल से जाना है। या फिर उन कड़ियों का टूट जाना है जो मेरे जैसे निर्मोहियों के मन में इस खेल के प्रति आसक्ति पैदा करती थी।

पता नहीं क्यों आपका रिकॉर्ड पर रिकॉर्ड बनाते जाना मुझे उन्मादी भले न बनाता रहा हो लेकिन आपका शतक से चूक जाना,कम रनों पर आउट हो जाना या फिर टीम से बाहर हो जाना दिल में हमेशा एक टीश पैदा करता रहा। ऐसा लगता था कि यह ठीक नहीं हुआ।
एक महत्वपूर्ण बात यह कि दुनिया ने आपको क्रिकेट का भगवान बना दिया। लेकिन मुझे हमेशा आपको ईश्वर कहने से परहेज रहा। यहां इसका मतलब यह नहीं है कि मैं नास्तिक हूं। वजह सिर्फ यह था कि इंसान भगवान कैसे हो सकता है। इंसान महान हो सकता है, महानतम हो सकता है लेकिन भगवान नहीं। क्योंकि भगवान तो मानव की कल्पनाओं,कलाओं और धारणाओं का निर्माण है जबकि आप तो हमारे सामने साक्षात रूप में मौजूद हैं। आपने भी हम इंसानों की तरह एक लंबा संघर्ष करके अपनी जगह बनाई है और यहां तक पहुंचे हैं।
यह जरूर है कि जब लोग आपको महानतम लोगों से आपकी तुलना करते हैं,डॉन ब्रेडमैन के समानांतर रखते हैं। जब ब्रायन लारा द्वारा यह कहा जाता है कि आपका जीवन अविश्वसनीय है और उदाहरण अतुलनीय तो वह यह सब कुछ मुझे भी अच्छा लगता है। जिस तरह आपने जीवन पथ से विचलित हुए बगैर जीने की कला का अविष्कार किया है,वह हमेशा मुझे आपकी ओर खींचता है।

कहा जा रहा है कि तेंदुलकर का क्रिकेट से रिटायरमेंट भारतीय क्रिकेट में एक युग का अंत है। जब से उन्होंने खेलना शुरू किया, तब से अब तक का समय सचिन के नाम से ही जाना जाएगा। वैसे बाकी दुनिया का तो पता नहीं लेकिन निजी तौर पर मेरे लिए आपकी विदाई क्रिकेट से मेरे अनुराग की भी विदाई है। ..... जाते-जाते मेरी तरफ से भी आपको 'सलाम'।

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