भारत के देह व्यापार में फंसतीं थाई और उज्बेक लड़कियां

Last Updated: शनिवार, 12 मई 2018 (14:24 IST)
सांकेतिक चित्र
भारत में अब दक्षिण एशिया से बाहर की महिलाओं को लाकर में धकेला जा रहा है। विडंबना यह है कि ये महिलाएं शोषण और उत्पीड़न से बचाए जाने के बावजूद कानूनी पचड़ों में फंसी रहती हैं और जल्द अपने देश नहीं लौट पातीं।

भारत में लंबे समय से बांग्लादेश और नेपाल से लाकर महिलाओं से देह व्यापार कराया जाता रहा है। नेपाल के अधिकारियों के साथ इस मुद्दे पर भारत के अधिकारी मिल कर काम कर रहे हैं जबकि बांग्लादेश के साथ भारत का रिपैट्रिएशन समझौता है जिसके तहत वहां के नागरिकों के वापस उनके देश भेजने का प्रावधान है। लेकिन अब दक्षिण एशिया से बाहर के देशों की महिलाओं को भी तस्करी के जरिए भारत लाया जा रहा है। इनमें खास तौर से और उज्बेकिस्तान की महिलाएं शामिल हैं।

तेलंगाना में राचकोंडा जिले के पुलिस प्रमुख महेश भगवत कहते हैं, "बांग्लादेश और नेपाल के साथ (रिपैट्रिएशन) प्रक्रिया ठीक तरह से काम करती है। लेकिन अब ऐसे देशों से भी लोगों को लाया जा रहा है जिनके साथ हमारी रिपैट्रिएशन संधि नहीं है।"


सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 2016 में बांग्लादेश से महिलाओं को तस्करी के जरिए भारत लाने के 33 मामले दर्ज किए गए जबकि 16 महिलाओं को नेपाल से लाया गया। उसी साल पुलिस ने थाईलैंड और उज्बेकिस्तान से होने वाली महिलाओं की तस्करी के भी 70 मामले दर्ज किए।

इससे पहले की रिपोर्टों में देह व्यापार पीड़ितों की राष्ट्रीयता के बारे में उल्लेख नहीं था। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के एक अधिकारी का कहना है कि थाईलैंड और उज्बेकिस्तान के नाम का उल्लेखन इसलिए किया गया है क्योंकि 2016 में तस्करी के ज्यादातर मामले इन्हीं दो देशों से सामने आए हैं।

2017 के आंकड़े मौजूद नहीं हैं, लेकिन अधिकारियों का कहना है कि पिछले साल के शुरुआती छह महीने में पुणे और में के नाम पर चल रहे देह व्यापार के ठिकानों से 40 थाई महिलाओं को बचाया गया है। 2017 में ही बाद में तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद के मसाज पार्लर और स्पा सेंटरों से 34 थाई महिलाओं को बचाया गया।

भगवत की टीम ने हैदराबाद में एक उज्बेक महिला को भी देह व्यापार से बचाया। लेकिन हाल में उसने आत्महत्या कर ली। भगवत कहते हैं कि करीब चार महीने पहले ही उसे उसके देश भेजने की प्रक्रिया शुरू हुई थी।

जब थॉमस रॉयटर्स फाउंडेशन ने इस बारे में उज्बेकिस्तान और थाईलैंड के दूतावासों की प्रतिक्रिया जानने के लिए फोन किया तो उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। जब दूतावास अधिकारियों को बताया गया कि मानव तस्करी के जरिए लाई गई उनके देश की एक नागरिक को बचाया गया है तो अधिकारियों ने कहा कि उन्हें व्यक्ति की पहचान और घर के पते की पुष्टि करनी होगी।

सामाजिक कार्यकर्ता कहते हैं कि इस तरह पुष्टि करना मुश्किल होगा क्योंकि पीड़ित महिलाएं अकसर गलत जानकारी देती हैं क्योंकि उन्हें इस बात का डर होता है कि तस्करी करने वाले एजेंट उन्हें या उनके परिवार को नुकसान पहुंचा सकते हैं।

प्रज्वला नाम के एक गैर सरकारी संगठन की सह संस्थापक सुनीता कृष्णन कहती हैं, "इन लड़कियों को तस्करी करने वाले अपने नियंत्रण में रखते हैं और उनसे बहुत सारी बातें कहलवाई जाती हैं और ये बातें बहुत ही मनगढ़ंत होती हैं।"

कृष्णन का कहना है कि आत्महत्या करने वाली उज्बेक महिला को प्रज्वला के ही एक सेंटर में रखा जा रहा था और जब उसे बचाया गया तो उसके पास फर्जी भारतीय पहचान दस्तावेज थे और शुरू में उसने यह बताने से भी मना कर दिया था कि वह किस देश से है। कृष्णन कहती हैं कि ज्यादा से ज्यादा देश भारत के साथ रिपैक्ट्रिएशन समझौते करें ताकि ताकि देह व्यापार से छुड़ाई गईं वहां की महिलाएं जल्द अपने देशों में जा सकें।

मानव तस्करी विरोधी समूह इम्पल्स एनजीओ नेटवर्क की संस्थापक हसीना खारबीह कहती हैं कि भारत में मसाज पार्लरों का उद्योग बढ़ रहा है और ज्यादातर ग्राहक थाईलैंड और उज्बेकिस्तान जैसे देशों की गोरे रंग वाली महिलाओं से मसाज कराने को प्राथमिकता देते हैं। वह कहती हैं, "भारत में विदेशी लड़कियों की मांग बढ़ रही है।"

एके/एमजे (थॉमस रॉयटर्स फाउंडेशन)

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