चीन में जीन में बदलाव कर बच्चों के जन्म का दावा

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Last Updated: शनिवार, 1 दिसंबर 2018 (12:00 IST)
एक चीनी वैज्ञानिक ने जुड़वां शिशुओं के पैदा होने से पहले ही उनमें बदलाव करने का दावा किया है। उन्होंने यूट्यूब पर वीडियो डालकर अपने प्रयोग के बारे में बताया। इस खबर से वैज्ञानिक स्तब्ध हैं और बहस शुरू हो गई है।  
 
के एक वैज्ञानिक ने दावा किया है कि उन्होंने दुनिया के पहले ऐसे शिशुओं को पैदा करने में सफलता पाई है, जिनके जीन्स में बदलाव किए गए हैं। चीनी यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हे जियानकुई ने यूट्यूब पर नवजात जुड़वा बहनों का वीडियो डालकर दावा किया कि इनके जीन्स में बदलाव किए गए हैं, जिससे इनका एचआईवी से बचाव हो सकेगा।  
 
एचआईवी से रोकना मकसद
शेनझान के अनुसंधानकर्ता ही जियानकुई ने कहा कि उन्होंने सात दंपतियों के बांझपन के उपचार के दौरान भ्रूणों को बदला जिसमें अभी तक एक मामले में संतान के जन्म लेने में यह परिणाम सामने आया। इन जुड़वा बहनों का डीएनए सीआरआईएसपीआर तकनीक से बदला गया।> > उन्होंने कहा कि उनका मकसद किसी वंशानुगत बीमारी का इलाज या उसकी रोकथाम करना नहीं है, बल्कि एचआईवी, एड्स वायरस से भविष्य में संक्रमण रोकने की क्षमता इजाद करना है, जो लोगों के पास प्राकृतिक रूप से हो। जियानकई ने कहा कि इस प्रयोग में शामिल माता-पिताओं ने अपनी पहचान जाहिर करने या साक्षात्कार देने से इनकार कर दिया है। उन्होंने कहा कि वह यह भी नहीं बताएंगे कि वे कहां रहते हैं और उन्होंने यह प्रयोग कहां किया।  
 
ऐसे किया प्रयोग
जियानकुई के ऑनलाइन किए गए दावे के बारे में एमआईटी टेक्नॉलजी रिव्यू के इंडस्ट्री जर्नल लेख प्रकाशित हुआ है। इस वीडियो के रिलीज होने के बाद से वैज्ञानिकों में बहस छिड़ी हुई है। जियानकुई का कहना है कि 'लुलू' और  'नाना' नाम की इन बहनों को आईवीएफ तकनीक से पैदा किया गया और गर्भ में प्रवेश होने से पहले ही अंडाणु में बदलाव कर दिए गए थे। उनके मुताबिक, ''शुक्राणुओं के प्रवेश के बाद भ्रूणविज्ञानी ने सीआरआईएसपीआर प्रोटीन को भी प्रवेश कराया, जिसका मकसद बच्चियों को एचआईवी संक्रमण से बचाना था।''
 
 
अनुसंधानकर्ता के इस दावे की स्वतंत्र रूप से कोई पुष्टि नहीं हो सकी है और इसका प्रकाशन किसी पत्रिका में भी नहीं हुआ है, जहां अन्य विशेषज्ञों ने इस पर अपनी मुहर लगाई हो। एमआईटी टेक्नॉलजी रिव्यू ने चेतावनी दी है कि यह तकनीक नैतिक रूप से सही नहीं है क्योंकि भ्रूण में परिवर्तन भविष्य की पीढ़ियों को विरासत में मिलेगा और अंततः समूचे को प्रभावित कर सकता है।
 
 
विवादास्पद है डीएनए में बदलाव
डीएनएन में बदलाव करने का मुद्दा बेहद विवादास्पद है और सिर्फ अमेरिका के लेबोरेटरी में इसे मंजूरी मिली है। पिछले साल अमेरिकी वैज्ञानिकों ने कहा था कि उन्होंने सूअर के बच्चों के जेनेटिक कोड में सफलतापूर्ण बदलाव किए, जिससे वे वायरल संक्रमण से बच सकें। हालांकि यह पहली बार नहीं है कि चीनी शोधकर्ताओं ने इंसानी भ्रूण के साथ प्रयोग किया हो। पिछले साल सितंबर में सुन यात-सेन यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने जीन एडिटिंग के एक वर्जन का इस्तेमाल किया था, जिससे इंसान के भ्रूण में परिवर्तन कराने वाली बीमारी को ठीक किया जा सके।
 
 
इस प्रयोग पर वैज्ञानिकों ने सावधानी बरतने को कहा है। मैसाच्यूसेट्स यूनिवर्सिटी में दर्शनशास्त्र के असिस्टेंट प्रोफेसर निकोलस इवांस ने ट्विटर पर चीनी वैज्ञानिक के दावों को 'जंगली' करार दिया। उन्होंने कहा, "यूट्यूब के जरिए वैज्ञानिक प्रयोग को दिखाना बड़ी समस्या की बात है क्योंकि वैज्ञानिक पद्धति और सहकर्मियों से समीक्षा नहीं ली जाती है।"
 
 
जियानकुई के शोध पर सवालिया निशान लगाते हुए कोलंबिया यूनिवर्सिटी में बायोकेमेस्ट्री के असिस्टेंट प्रोफेसर सैम स्टर्नबर्ग ने कहा है कि चीनी वैज्ञानिक के शोध का मकसद जीवन को खतरनाक स्थिति या आनुवांशिक बीमारियों से बचाने के लिए नहीं था। उन्होंने ट्वीट किया, ''वीडियो से यह तथ्य गायब है कि बदलाव उन भ्रूणों में किए गए हैं, जिन्हें एचआईवी नहीं था। बहरहाल विज्ञान को अनुमति देने या रोक देने के संबंध में जियानकई का कहना है कि भविष्य के बारे में समाज फैसला करेगा।
 
 
वीसी/एमजे (एएफपी, डीपीए)
 


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