भगवान ऋषभनाथ को जानें

jain Dharm
अनिरुद्ध जोशी|
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- अनिरुद्ध जोशी 'शतायु' वृषभ का अर्थ होता है बैल। को भी कहा जाता है। कैलाश पर्वत पर ही को कैवल्य ज्ञान प्राप्त हुआ था। नाथ कहने से वे नाथों के नाथ हैं। वे जैनियों के ही नहीं हिंदू और सभी धर्मों के हैं , क्योंकि वे परम प्राचीन आदिनाथ हैं।> > महामानव का जन्म : वृषभनाथ को जैन ऋषभदेव कहते हैं। इन्हीं से जैन धर्म या श्रमण परम्परा का प्रारम्भ माना जाता है। यह जैनियों के प्रथम तीर्थंकर हैं। इनसे पूर्व जो मनु हुए हैं वही जैनियों के कुलकर हैं। कुलकरों की क्रमश: 'कुल' परम्परा के सातवें कुलकर नाभिराज और उनकी पत्नी मरुदेवी से ऋषभ देव का जन्म चैत्र कृष्ण-9 को अयोध्या में हुआ। ऋषभदेव स्वायंभू मनु से पाँचवीं पीढ़ी में इस क्रम में हुए- स्वायंभू मनु, प्रियव्रत, अग्नीघ्र, नाभि और फिर ऋषभ। कुलकर नाभिराज से ही इक्क्षवाकु कुल की शुरुआत मानी जाती है।

जब ऋषभदेव माँ के गर्भ में थे तब उनकी माँ ने चौदह (या सौलह) शुभ चीजों का सपना देखा था। उन्होंने देखा कि एक सुंदर सफेद बैल उनके मुँह में प्रवेश कर गया है। एक विशालकाय हाथी जिसके चार दाँत हैं, एक शेर, कमल पर बैठीं देवी लक्ष्मी, फूलों की माला, पूर्णिमा का चाँद, सुनहरा कलश, कमल के फूलों से भरा तालाब, दूध का समुद्र, देवताओं का अंतरिक्ष यान, जवाहरात का ढेर, धुआँरहित आग, लहराता झंडा और सूर्य।

राजा ऋषभदेव :
अयोध्या के राजा नाभिराज के पुत्र ऋषभ अपने पिता की मृत्यु के बाद राज सिंहासन पर बैठे और उन्होंने कृषि, शिल्प, असि (सैन्य शक्ति ), मसि (परिश्रम), वाणिज्य और विद्या इन छह आजीविका के साधनों की विशेष रूप से व्यवस्था की तथा देश व नगरों एवं वर्ण व जातियों आदि का सुविभाजन किया। इनके दो पुत्र भरत और बाहुबली तथा दो पुत्रियाँ ब्राह्मी और सुंदरी थीं जिन्हें उन्होंने समस्त कलाएँ व विद्याएँ सिखाईं।


Rishabhnath ji
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ऋषभदेव का योगदान :
ऋषभदेव की मानव मनोविज्ञान में गहरी रुचि थी। उन्होंने शारीरिक और मानसिक क्षमताओं के साथ लोगों को श्रम करना सिखाया। इससे पूर्व लोग प्रकृति पर ही निर्भर थे। वृक्ष को ही अपने भोजन और अन्य सुविधाओं का साधन मानते थे और समूह में रहते थे।

ऋषभदेव ने पहली दफा कृषि उपज को सिखाया। उन्होंने भाषा का सुव्यवस्थिकरण कर लिखने के उपकरण के साथ संख्याओं का अविष्कार किया। नगरों का निर्माण किया। बर्तन बनाना, स्थापत्य कला, शिल्प, संगीत, नृत्य और आत्मरक्षा के लिए शरीर को मजबूत करने के गुरु सिखाए। साथ ही सामाजिक सुरक्षा और दंड संहिता की प्रणाली की स्थापना की।

उन्होंने दान और सेवा का महत्व समझाया। जब तक राजा थे उन्होंने गरीब जनता, संन्यासियों और बीमार लोगों का ध्यान रखा। उन्होंने चिकित्सा की खोज में भी लोगों की मदद की। नई-नई विद्याओं को खोजने के प्रति लोगों को प्रोत्साहित किया। भगवान ऋषभदेव ने मानव समाज को सभ्य और सम्पन्न बनाने में जो योगदान दिया है उसके महत्व को सभी धर्मों के लोगों को समझने की आवश्यकता है।


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