चीन ने भारत को दी स्थिति बिगड़ने की धमकी

Last Updated: सोमवार, 17 जुलाई 2017 (15:22 IST)

बीजिंग। चीन के सरकारी प्रचार तंत्र ने बीते शुक्रवार को कहा कि सीमा विवाद का कोई समाधान तब तक संभव नहीं है, जब तक भारत अपने सैनिकों को वापस नहीं बुलाता और बीजिंग की इस मांग को अनसुना करने से हालात और बदतर होंगे। विदित हो कि
भारत के विदेश मंत्रालय ने बीते गुरुवार को कहा था कि दोनों देशों के बीच सिक्किम सेक्टर में सीमा पर बरकरार गतिरोध के समाधान के लिए कूटनीतिक तरीके उपलब्ध हैं।

मामले पर भारत के रुख से नाराज चीन को ऐसे उत्तर की उम्मीद नहीं थी। एक
समाचार एजेंसी सिन्हुआ के लेख में भारत के प्रस्ताव को खारिज करते हुए कहा गया है कि जबतक भारतीय सैनिक डोकलाम को खाली नहीं करते, बातचीत की कोई गुंजाइश नहीं है। विदित हो कि डोकलाम, चीन और भूटान के बीच एक विवादित क्षेत्र है। लेख में इस आशय के संकेत दिए गए है कि इस मामले को लेकर भारतीय पक्ष इतना कड़ा रुख अपनाएगा। लेकिन अब चीन के मुताबिक, 'चीन ने साफ कर दिया है कि इस घटना पर बातचीत की कोई गुंजाइश नहीं है और भारत को डोकलाम से अपने सैनिकों को वापस बुलाना चाहिए।'
सिन्हुआ की रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि अगर चीन की मांगों को भारत अनसुना कर देता है तो एक महीने से चल रहा ये‍ गतिरोध और भी बदत्तर हो सकता हैं। चीन के अनुसार इससे भारत खुद को मुश्किल में डाल रहा है। लेख में आगे लिखा है कि कूटनीतिक प्रयासों से सैनिकों के बीच टकराव का अच्छे से अंत हुआ है. लेकिन इस बार मामला बिल्कुल अलग है। इस लेख के मुताबिक, 'हाल के सालों में कुछ भारतीय गैर समूह राष्ट्रवाद की भावना से प्रेरित होकर चीन विरोधी भावनाओं को हवा दे रहे हैं।'
जानकारों का कहना है कि इस तनाव को कम करने के लिए दोनों देशों के रिश्तों
को काले-सफेद की परिभाषा में नहीं देखे जा सकते हैं। उम्मीद यही है कि चीन भी ऐसा ही समझता है। लेकिन दोनों में से किसी को भी सेना को पीछे हटाने की जल्दी नहीं है।
अक्सर ऐसे ही मामलों में चीन अपने हजारों वर्ष पुराने नक्शे दिखाकर दावा करता आया है कि यह भूभाग उसकी सीमा का हिस्सा रहा है और इसके साथ उसका परम्परागत अडि़यलपन सामने आता है।

दोनों में से कोई भी सेना पीछे हटने की जल्दी में नहीं। वास्तव में जिस इलाके को चीन प्राचीन काल से अपना बताकर सड़क बनाने की कोशिश कर रहा है और भारत को पीछे हटने को कह रहा है, भारत लगातार उसे भूटान का क्षेत्र बताते हुए चीन को पीछे हटने को कह रहा है। भूटान की जमीन को लेकर भारत का यह रुख इसलिए है क्योंकि भूटान से उसका रणनीतिक समझौता है जिसके तहत सैन्य मदद उसे मिलती है।
लेकिन ऐसी हालत में जो लगातार सवाल उठ रहे हैं उनमें से एक यह है कि आखिर यह तनाव कम कैसे होगा? कैसे सुलझेगा यह मामला? क्या कूटनीति काम आएगी या अब सीधी लड़ाई का ही रास्ता बचा है? ऐसे में यह जरूरी है कि हम पिछले कुछ सालों में जब जब इस प्रकार का तनाव हुआ है उस पर नजर डालें और इस बार जो बातें अलग हैं उस पर भी नजर डालें।

एक ऐसी ही घटना के तहत 15 अप्रैल 2013 को चीनी सेना की एक प्लाटून जितनी बड़ी एक टुकड़ी ने अकसाई चिन-लद्दाख वास्तविक नियंत्रण रेखा के पास दौलत बेग ओल्डी से 30 किलोमीटर दूर राकी नाले के पास टेंट गाड़ लिए थे। भारतीय सेना ने तुरंत कार्रवाई करते हुए 300 मीटर की दूरी पर अपना कैंप बना लिया। तीन हफ्ते तक यही स्थिति बनी रही। बातचीत के दौर चले और आखिर 5 मई को दोनों सेनाएं पीछे हटीं। तब चीन ने इस शर्त पर अपनी सेना को हटाया था कि भारतीय सेना चुमार सेक्टर में अपने बनाए कुछ ढांचे हटाएगी।

ठीक इस घटना के पहले 29 मार्च 2013 को डरबन में चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने बयान दिया था कि सीमा विवाद जल्द से जल्द सुलझा लिए जाना चाहिए। लेकिन तबउस वक्त भी चीन ने यह मानने से साफ इनकार कर दिया था कि उसने वास्तविक नियंत्रण रेखा को पार किया था। चीनी विदेश मंत्रालय ने कहा कि बातचीत से मसले को शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाने के लिए वह प्रतिबद्ध है।

सितंबर 2014 की एक घटना की तरह इस बार भी चीनी मजदूर वास्तविक नियंत्रण रेखा पार कर भारत की तरफ आए और कहा कि उन्हें टिबल तक सड़क बनाने का आदेश है। टिबल लद्दाख के चुमार इलाके में सीमा के पांच किलोमीटर अंदर है। इन्हें रोकने पर चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने भारतीय सीमा के अंदर तीन जगहों पर तंबू गाड़ लिए थे।

अचरज की बात यह रही कि इसी वक्त चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग भी भारत दौरे पर थे। आखिर कूटनीतिक बातचीत और इस शर्त पर कि भारतीय सेना टिबल में बनाई गई निगरानी चौकी को गिराएगी पर दोनों सेनाएं 16 दिन बाद धीरे-धीरे 30 सितंबर को पीछे हटीं।

अब जून 2017 की घटना का इलाका भूटान का है लेकिन असर भारत पर भी पड़ेगा क्योंकि इस स्थान पर उत्तर-पूर्व जिस जमीन के पतले टुकड़े के जरिए पूरे देश से जुड़ा वह सिलीगुड़ी कॉरिडोर या 'चिकेन्स नेक' भारत के लिए अहम है। अगर चीन इस क्षेत्र पर कब्जा कर ले भारत का पूर्वोत्तर का समूचा इलाका चीन के नियंत्रण में जा सकता है।
सीमा के बहुत पास झालोंग में जलडका नदी पर भारत की एक पनबिजली परियोजना भी है। यह परियोजना भूटान तक पहुंचने के लिए पुल का भी काम करती है।

मतलब अगर चीन यहां पर कब्जा करता है तो भारत का कुछ अहम बुनियादी ढांचा भी चीन की जद में आ जाएगा। फिलहाल भारत इस वक्त इलाके में ऊंचाई पर है। इस इलाके में चीन के आगे बढ़ने पर वह दो तरफ से उसे घेर सकता है और आगे बढ़ना रोक सकता है। इसलिए रणनीतिक तौर पर भी यह बेहद जरूरी है कि भारत यहां पर मजबूती से कदम जमाए हुए है।
सवाल यह उठ रहे हैं कि जब 7 जुलाई को जर्मनी के हैम्बर्ग में प्रधानमंत्री मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग की मुलाकात हुई और कई मुद्दों पर बात हुई। निश्चित तौर पर इस मुद्दे पर भी बात हुई होगी तो अब तक चीन की सेना लौटी क्यों नहीं है? इस मुद्दे पर बात हुई भी या नहीं? इसका कोई सीधा सपाट जवाब भी सरकार ने नहीं दिया है।

सबसे पहले तो यह समझना जरूरी है कि शायद ही चीन को उम्मीद रही होगी कि इस इलाके में ऐसे सड़क बनाने पर भारत की इतनी मजबूत प्रतिक्रिया होगी क्योंकि यह जमीन भूटान की है, भारत की नहीं। दूसरा यह कि अब ऐसी स्थिति में पीछे हटे तो चीनी नेतृत्व आखिर अपने आपको जनता के सामने सर्वोपरि कैसे दिखाएगा? इसीलिए नाथू ला होकर कैलाश मानसरोवर यात्रा उसने रद्द कर दिया। रोज चीनी विदेश मंत्रालय से तीखे बयान आते रहे हैं और कश्मीर में मध्यस्थता तक की पेशकश कर दी गई।

परमाणु शक्ति से लैस देश से चीन भी भारत से सीधी लड़ाई चाहेगा ऐसा नहीं है चाहे भारत की तरह उसकी 'नो फर्स्ट यूज' पॉलिसी न हो। हैम्बर्ग में जिस तरह दोनों नेताओं ने एक-दूसरे की तारीफ की, शुभकामनाएं दीं, जिस तरह भारत के कुछ मंत्री हाल में चीन में थे, जिस तरह राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जुलाई के आखिरी हफ्ते में ब्रिक्स की एक बैठक में भाग लेने चीन जा रहे हैं, लड़ाई की कगार पर खड़े देशों के बीच अक्सर ऐसा होता नहीं।

यह मानना भी शायद गलत होगा कि दोनों शीर्ष नेताओं की बातचीत के अलावा कहीं कुछ और बात नहीं हुई होगी, कोई कूटनीतिक कोशिश नहीं हुई होगी। और अगर ऐसा हुआ है तो पिछले उदाहरणों को देखते हुए, शायद चीन की तरफ से कोई न कोई शर्त रखी जाएगी और फिर धीरे-धीरे एक ही साथ दोनों सेनाएं पीछे हटना शुरू करें। तब तक
भारतीय सेना को इस तरह का दबाव झेलना पड़ेगा। (एजेंसी)

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