जासूसी एजेंटों की सनसनीखेज कारगुजारियां

Author शरद सिंगी|
किसी भी देश की प्रतिरक्षा में उस देश की खुफिया एजेंसी की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इस एजेंसी (विभाग) का काम देश को क्षति पहुंचाने वाली साजिशों का पता लगाना तथा विदेशी जासूसों की हरकतों और विदेशी खतरों पर नजर रखना होता है।
किंतु कई देशों में वहां के शासक द्वारा इनका उपयोग अपने प्रतिद्वंद्वियों एवं विपक्षी नेताओं पर नजर रखने या उन्हें रास्ते से हटाने के लिए भी किया जाता है। वहां के गुप्तचर मात्र सूचनाएं ही एकत्रित नहीं करते हैं अपितु वक्त आने पर अपने मालिक या देश के लिए जान लेने और देने को तत्पर रहते हैं। सचमुच इनके इरादे दृढ़, दिमाग शातिर और शरीर फौलाद के होते हैं।

आपको यह जानकर कम आश्चर्य नहीं होगा कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई विश्व की बेहतरीन खुफिया एजेंसियों में से एक मानी जाती है। कुछ विशेषज्ञ तो उसे श्रेष्ठता की सूची में प्रथम स्थान भी देते हैं और कुछ पहले 5 में शामिल करते हैं। सूची के अन्य देशों में हैं- अमेरिका की सीआईए, रूस की केजीबी, इंग्लैंड की एमआई सिक्स और इनके के बाद भारत की रॉ, इसराइल की मोसाद और जर्मनी की बीएनडी के नंबर हैं।
इन एजेंसियों के ऑपरेशन कभी रहस्य/रोमांच से भरे तो कभी रोंगटे खड़े करने वाले अविश्वसनीय होते हैं। जब इनके जासूस किसी दुश्मन देश में अपने ऑपरेशन को अंजाम देकर साफ बच निकलते हैं। पहले और दूसरे विश्वयुद्ध के तो अनेक किस्से प्रचलित हैं किंतु यहां इस सदी के ऐसे ही कुछ सर्वाधिक चर्चित किस्सों पर एक नजर डालते हैं।

विगत वर्ष की सबसे सनसनीखेज घटना थी उत्तरी कोरिया के जासूसों द्वारा उत्तरी कोरिया के तानाशाह 'किम जोंग उन' के सौतेले बड़े भाई 'किम जोंग नाम' की मलेशिया में हत्या करवाना। तानाशाह का यह भाई उत्तरी कोरिया की शासक गद्दी का प्रमुख दावेदार था किंतु राजनीति में रुचि न होने से मलेशिया में निर्वासित जीवन व्यतीत कर रहा था।
खबरों के अनुसार उत्तरी कोरिया के जासूसों ने पहले तो वियतनाम और इंडोनेशिया की दो महिलाओं को धन का लालच देकर अपनी साजिश का हिस्सा बनाया। फिर उन्हें ट्रेनिंग दी गई और कुआलालंपुर एयरपोर्ट पर एक जहरीले पदार्थ को 'किम जोंग नाम' के मुंह पर लगाकर उसकी हत्या कर दी गई। खबरों की मानें तो यह हत्या राजनीतिक प्रतिद्वंद्वता की वजह से की गई थी। हत्या होने के पहले ही साजिश रचने वाले जासूसों का दल मलेशिया से फरार हो गया और मलेशिया पुलिस के हाथ कोई नहीं आया।
सन् 2011 में अमेरिका के नागरिक रेमंड डेविस का नाम तब बहुत चर्चित हुआ था, जब उसने पाकिस्तान में भरे बाजार हथियारों से लैस 2 संदिग्ध आतंकियों की गोली मारकर हत्या कर दी थी। रेमंड डेविस को पाकिस्तान की अमेरिकी एम्बेसी में एक ठेकेदार के बतौर लाया गया था। हत्या करने के बाद पाकिस्तान की पुलिस ने उसे जेल में बंद भी कर दिया था।

अमेरिका ने पहले तो उसे एक राजनयिक को मिलने वाली कानूनी सुरक्षा के आवरण का हवाला देते हुए छुड़ाने की कोशिश की थी, परंतु जब वह कामयाब नहीं हुई तो अमेरिका ने शरिया कानून का उपयोग करते हुए परिवार वालों को 'दिया राशि' (ब्लड मनी) देकर हत्याकर्ता रेमंड डेविस को छुड़ा लिया और उसे आनन-फानन में पाकिस्तान से बाहर कर दिया। पाकिस्तानी अखबारों के अनुसार वह अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआईए का एक प्रमुख एजेंट था, जो पाकिस्तान में एक मिशन के तहत आया था और जिसे अमेरिका ने अपनी पूरी शक्ति लगाकर छुड़वा लिया।
सन् 2010 में दुबई के एक होटल में फिलिस्तीन के उग्रवादी संगठन हमास के एक महत्वपूर्ण लीडर की हत्या की गई थी। दुबई पुलिस के अनुसार करीब 26 लोग जाली पासपोर्ट पर अलग-अलग यूरोपीय देशों से दुबई पहुंचे थे। किसी को संदेह न हो इसलिए वे अलग-अलग होटलों में रुके थे। कहते हैं कि वे इस फिलिस्तीनी लीडर का (जो 2 इसराइली सैनिकों की हत्या का आरोपी था) सीरिया के शहर दमिश्क से पीछा कर रहे थे।

दुबई में एक समन्वित योजना के तहत वे इस लीडर की होटल में घुसे और उसे बिजली के करंट का झटका देकर और उसका दम घोंटकर हत्या कर दी। वारदात को अंजाम देने के तुरंत बाद इन जासूसों ने अलग-अलग फ्लाइट से अलग-अलग देशों की राह पकड़ ली और दुबई पुलिस की पहुंच के बाहर हो गए। अंतरराष्ट्रीय जगत में यह माना जाता है कि इसराइली सरकार के आदेश पर ही इसराइल की खुफिया एजेंसी मोसाद ने इस बदले को अंजाम दिया था।
सन् 2006 में यूनाइटेड किंगडम में एक पूर्व रूसी जासूस अलेक्जेंडर लिटविनेंको की हत्या की गई थी जिसने यूके में शरण ले रखी थी। मान्यता है कि इसकी हत्या के आदेश सीधे रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने दिए थे। इस हत्या के बाद ब्रिटेन और रूस के संबंधों में तनाव भी आ गया था।

इस रूसी जासूस ने ब्रिटेन में शरण लेने के पश्चात रूस सरकार की कटु आलोचनाएं शुरू कर दी थीं। और तो और, वह ब्रिटेन की खुफिया एजेंसी का एक मोहरा भी बन गया था। जांच रिपोर्ट के अनुसार किसी रूसी खुफिया एजेंसी के एजेंट ने उसकी चाय में रेडियोधर्मी पदार्थ मिला दिया था, फलत: 20 से 25 दिनों तक वह मौत से जूझता रहा और अंत में उसकी मृत्यु हो गई। आज तक जहर देने वाले का कुछ पता नहीं चला।
उपरोक्त घटनाओं से स्पष्ट है कि ये जासूसी एजेंसियां कितनी खतरनाक होती हैं। इन्हें इनकी सरकारों का पूरा समर्थन प्राप्त होता है और इनके पास किसी की भी जान लेने का लाइसेंस होता है। इनमें काम करने वाले जांबाज एजेंट छद्म नाम पर जीते हैं और छद्म नाम में ही मर जाते हैं।

यदि किसी ऑपरेशन में ये पकड़े या मारे जाते हैं तो इनकी सरकारें इन्हें अपना शहरी या मुलाजिम मानने से भी इंकार कर देती हैं। पाकिस्तान संबंधी ऐसे अनेक उदाहरण हमारे सामने हैं। इनकी शहादत इतिहास में शायद ही कभी उल्लेखित होती है। सच कहें तो शायद इन्हें अपने नाम की परवाह भी नहीं होती। ये अपने देश के लिए गुमनामी में जीते हैं, काम करते हैं और गुमनामी में ही मर जाते हैं।

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