छत्रपति शिवाजी महाराज

शिवाजी की नौसैनिक परंपरा

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जन्म : 19 फरवरी 1627 मृत्यु : 3 अप्रैल 1680 >
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पृथ्वी तल पर 2/3 भाग जल व शेष भूमि है। इसी से जल का महत्व स्पष्ट होता है। मात्र यातायात ही नहीं, एक युद्धक्षेत्र से दूसरे तक, सेनाओं का स्थानांतर, जल से होकर ही होता है। 4000 मील लंबे भारतीय समुद्र तट को देखते हुए नौसेना का महत्व स्पष्ट है। मध्ययुगीन भारत में, शिवाजी पहले राजा थे, जिन्होंने नौसेना का महत्व देखकर उसका निर्माण किया।> इस विषय में उनकी दृष्टि इतनी पैनी थी कि उन्होंने आदेश दिए थे कि विदेशी साहूकार-व्यापारी उदाहरणार्थ फिरंगी, फरांशिस, वलंदेज, डिंगमार (आधुनिक अँगरेज, फ्रांसीसी, हॉलैंडवासी, डेनमार्कवासी) इत्यादि को समुद्र तट पर स्थान न दिया जाए। देना ही हो, तो तट से दूर, भूमि पर स्थान देकर, इन्हें कड़ी निगरानी में रखा जाए, क्योंकि तट पर रहकर ये अन्य से मिल राज्य के लिए खतरा बन सकते हैं व फिर इन्हें तट से हटाना मुश्किल होता है।

शिवाजीकालीन नीति-निर्देश सिद्धांत 'आज्ञापत्रों' में हैं। इनका लेखक विवादास्पद है, परंतु रचना का गांभीर्य बताता है कि लेखक वरिष्ठ मंत्री के स्तर का होगा। एक मत तो यह भी है कि पूना से आगरा तक औरंगजेब के सामने उपस्थित होने हेतु यात्रा (मार्च 1666) में, भविष्य अनिश्चित जानकर, उन्होंने अपने लिपिकों को जो बिंदु बताए, उन्ही का विकसित रूप यह श्रेष्ठ रचना है।
 
  शिवाजी ने नौसेना निर्माण व उसके नित्य कार्य में यह ध्यान रखा था कि राज्यकार्य संपन्न होते समय प्रजा को रंचमात्र दुःख न हो। यह प्रशासकीय नीति उनकी दूरदर्शिता व लोककल्याण मनोवृत्ति का प्रतीक है। शिवाजी की नौसैनिक दूरदर्शिता अत्यंत श्रेष्ठ स्तर की थी।      


रचयितानुसार नौसेना स्वतंत्र राजयोग ही है। कहा गया है, 'जैसे अश्वदल से भूमि पर राज्य वैसे नौसेना से जल पर राज्य/वर्चस्व' होता है। नौसेना निर्माण हेतु कहा गया है कि गतिशील पोत मँझले आकार के हों ताकि व्यय सीमा में रहे। तेज हवा से ही चलने वाले युद्धक पोत बनाना जरूरी नहीं है। स्पष्ट है शिवाजी महाराज का जोर छोटे व तेज गति वाले पोतों को बनाने पर था।

सबसे गंभीर निर्देश नौसेना के वेतन के लिए है। वह यह कि यह वेतन बंदरगाहों की 'पैदास्त' (तटकर) में से न दें, क्योंकि इससे नौसेना व तटकर अधिकारी मिलकर व्यापारियों से अधिक वसूलेंगे व व्यापार को हानि होगी। दूसरा अहित यह होगा कि नौसेना नागरिक प्रशासन के संपर्क में होगी, जिसका प्रभाव नौसेना के अनुशासन पर होगा। अतः उसे स्थानीय प्रजा से दूर रखकर, वेतन सीधे राजकोष से दें।

नौसेना अधिकारियों में हर पाँच जहाजों पर एक अधिकारी 'सूबा' रखें। इनके ऊपर एक अधिकारी 'सरसूबा' हो। जहाजों पर छोटी-बड़ी तोपें, गोली-बारूद, हथगोले व वीर सिपाही रखें, जो इन साधनों का उपयोग संकट में कर सकें।


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