क्या है इन्द्रजाल, जानिए रहस्य...

अनिरुद्ध जोशी 'शतायु'|
संकलन: अनिरुद्ध जोशी 'शतायु' का नाम सुनते ही सभी को लगता है कि यह कोई मायावी विद्या है। बहुत से लोग इसे तंत्र, मंत्र और यंत्र से जोड़कर देखते हैं। कई लोग तो इसे काला जादू, वशीकरण, सम्मोहन, मारण और मोहन से भी जोड़कर देखते हैं। हालांकि फारसी में इसे तिलिस्म कहा जाता है। यह शब्द भी भारत में बहुत प्रचलित है जो जादू के संदर्भ में इस्तेमाल किया जाता है।
 
 
प्राचीनकाल में इस विद्या के कारण भी भारत को विश्व में पहचाना जाता था। देश-विदेश से लोग यह विद्या सिखने आते थे। आज पश्‍चिम देशों में तरह-तरह की जादू-विद्या लोकप्रिय है तो इसका कारण है भारत का ज्ञान।> > जादू अनंतकाल से किया जाने वाला भरा प्रदर्शन है, जिसका उपयोग पश्चिमी धर्मों व सम्प्रदायों के प्रचारक अशिक्षित लोगों को डराकर, सम्मोहित कर या छलपूर्ण तरीके से उन्हें अपना आज्ञाकारी अनुयायी बनाने के लिए किया करते थे। 
 
माना जाता है कि गुरु दत्तात्रे भी इन्द्रजाल के जनक थे। चाणक्‍य ने अपने अर्थशास्‍त्र में एक बड़ा भाग विद्या पर लिखा है। सोमेश्‍वर के मानसोल्‍लास में भी इन्द्रजाल का उल्लेख मिलता है। उड़ीसा के राजा प्रताप रुद्रदेव ने 'कौतुक चिंतामणि' नाम से एक ग्रंथ लिखा है जिसमें इसी तरह की विद्याओं के बारे में उल्लेख मिलता है। बाजार में कौतुक रत्‍नभांडागार, आसाम और बंगाल का जादू, मिस्र का जादू, यूनान का जादू नाम से कई किताबें मिल जाएगी, लेकिन सभी किताबें इन्द्रजाल से ही प्रेरित हैं।
 
इन्द्रजाल के अंतर्गत मंत्र, तंत्र, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण, नाना प्रकार के कौतुक, प्रकाश एवं रंगादि के प्रयोजनीय वस्तुओं के आश्चर्यजनक खेल, तामाशे आदि सभी का प्रयोग किया जाता है। इन्द्रजाल से संबंधित कई किताबें बाजार में प्रचलित है। उन्हीं में से एक बृहत् इन्द्रजाल अर्थात कौतुकरत्न भाण्डागार किताब बहुत ही प्रचलित है। खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन बंबई से प्रकाशित इस किताब में पंडित देवचरणजी अवस्थी द्वारा इन्द्रजाल से संबंधित सभी विषयों को संग्रहित किया गया है। हालांकि यहां यह बताना जरूरी है कि उक्त किताबों की विद्या में कितनी सच्चाई है यह हम नहीं जानते। इन्द्रजाल के नाम पर अंधविश्‍वास या काले जादू का ही ज्यादा प्रचलन है।
 
अगले पन्ने पर इन्द्रजाल का पहला रहस्य...
 


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